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पीपल का वृक्ष भारतीय संस्कृति में ‘देव वृक्ष’ माना जाता है. धार्मिक महत्व के साथ-साथ इसमें कई औषधीय और पर्यावरणीय गुण भी पाए जाते हैं. आयुर्वेद में इसके पत्तों, छाल और फल का उपयोग कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है, वहीं यह वातावरण को शुद्ध करने और जीवन को संतुलित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद में पीपल के वृक्ष को ‘देव वृक्ष’ की संज्ञा दी गई है. यह सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि पृथ्वी पर जीवन का रक्षक है, जहां एक ओर यह धार्मिक रूप से पूजनीय है. वहीं, दूसरी ओर इसके औषधीय और पर्यावरणीय लाभ इसे विज्ञान की दृष्टि से भी सर्वोच्च स्थान दिलाते हैं.

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार पीपल के वृक्ष में 33 करोड़ देवी-देवताओं का निवास माना जाता है. इसे साक्षात भगवान विष्णु का रूप भी कहा गया है. शनिवार के दिन पीपल की जड़ में जल अर्पित करना और दीपक जलाना शुभ माना जाता है, जिससे गृह क्लेश और ग्रहों के दोष दूर होते हैं. यह कई जीव-जंतुओं और पक्षियों का आश्रय स्थल भी है.

पीपल दुनिया के उन गिने-चुने पेड़ों में से है, जो दिन के साथ-साथ रात में भी भारी मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ते हैं. यह प्रदूषण को कम करने और इकोसिस्टम को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसकी घनी छाया न केवल शीतलता प्रदान करती है, बल्कि वायुमंडल को शुद्ध भी करती है.
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चरक और सुश्रुत संहिता जैसे महान आयुर्वेदिक ग्रंथों में पीपल के पत्तों, छाल और फल के अद्भुत गुणों का वर्णन है. खाली पेट पीपल के पत्तों का पानी पीने से पाचन एंजाइम सक्रिय होते हैं, जिससे कब्ज और अपच जैसी समस्याएं दूर होती हैं.

दाद, खाज और खुजली होने पर पीपल के पत्तों का लेप जादुई असर दिखाता है. वहीं, फटी एड़ियों पर पीपल का दूध लगाने से वे मुलायम हो जाती हैं. वहीं, इसके पत्तों में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करते हैं और हृदय की मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करते हैं.

एंटीसेप्टिक गुणों के कारण, चोट लगने पर पीपल के पत्तों का पेस्ट लगाने से संक्रमण नहीं फैलता और घाव तेजी से भरता है. वहीं, पीपल का वृक्ष हमें सिखाता है कि प्रकृति के पास हर समस्या का समाधान है, बस हमें उसे सहेजने और समझने की आवश्यकता है.