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बॉलीवुड में जब भी खान तिकड़ी के दबदबे की बात होती है, तो एक नाम अक्सर ‘साइलेंट वॉरियर’ के तौर पर सामने आता है और वो है अक्षय कुमार का. 90 का दशक जहां रोमांस और चॉकलेटी हीरो का दौर था, वहीं अक्षय ने सुनील शेट्टी, सैफ अली खान और अजय देवगन के साथ मिलकर एक्शन और मसाला सिनेमा का एक नया रास्ता खोला. उन्होंने साबित कर दिया कि बिना किसी गॉडफादर के भी बॉक्स ऑफिस पर सफलता मिल सकती है. 2007 में तो लगातार चार ब्लॉकबस्टर फिल्में देकर उन्होंने इंडस्ट्री पर एकतरफा राज कर लिया था.
नई दिल्ली. 90 के दशक की शुरुआत में बॉलीवुड ‘राज’ और ‘प्रेम’ जैसे रोमांटिक किरदारों के जादू में डूबा हुआ था. उस समय शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान की पॉपुलैरिटी अपने पीक पर थी, लेकिन उसी दौर एक और एक्टर अक्षय कुमार ने खान्स से कभी हार नहीं मानी. उन सभी की पॉपुलैरिटी को उन्होंने अपने ऊपर कभी हावी होने नहीं दिया. उन्होंने चुपचाप काम किया, अपनी ताकत को पहचाना और एक ‘साइलेंट वॉरियर’ बन गए, जिन्होंने जल्दी ही बॉक्स ऑफिस का तख्त हिला दिया.
कहा जाता है कि 90 के दशक में अक्षय कुमार ने समझदारी से अपनी स्ट्रेटेजी बनाई. वह जानते थे कि सोलो फिल्मों और मल्टी-स्टारर फिल्मों, दोनों में अपनी पहचान बनाना जरूरी है. इसी सोच ने बॉलीवुड को एक्टर्स की एक ऐसी जोड़ी दी, जिन्होंने खान्स की रोमांटिक फिल्मों के पैरेलल एक्शन सिनेमा का एक नया एम्पायर बनाया. ‘मोहरा’, ‘वक्त हमारा है’ और ‘सपूत’ जैसी फिल्मों ने दर्शकों को वह जबरदस्त एक्शन दिया जो उस समय खान फिल्मों में नहीं था. सुनील शेट्टी के साथ उनकी केमिस्ट्री ने बड़े पैमाने पर दर्शकों को थिएटर तक खींचा.
‘ये दिल्लगी’ और ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ ने अक्षय की इमेज को कुछ नरम किया. सैफ अली खान के साथ उनकी कॉमिक टाइमिंग ने साबित कर दिया कि अक्षय न सिर्फ हाथ-पैर चला सकते हैं, बल्कि अपनी कॉमेडी से दिल भी जीत सकते हैं. इस बीच ‘सुहाग’ में अजय देवगन और अक्षय कुमार की जोड़ी ने एक्शन सीन को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. अक्षय ने मिलकर एक ऐसा फ्रंट बनाया जिसने सिंगल-स्क्रीन सिनेमा पर खान्स की पकड़ को कमजोर कर दिया.
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‘खिलाड़ी’ ब्रांड का उदय: 90 के दशक के बीच में अक्षय ने ‘खिलाड़ी’ सीरीज लॉन्च की. ‘खिलाड़ी’, ‘सबसे बड़ा खिलाड़ी’ और ‘खिलाड़ियों का खिलाड़ी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हॉलीवुड एक्शन स्टार्स के बराबर एक ब्रांड के रूप में स्थापित किया. ऐसे समय में जब अमिताभ बच्चन का दौर खत्म हो रहा था और खान्स रोमांस में व्यस्त थे, अक्षय ने खुद को देश के सबसे बड़े एक्शन आइकन के रूप में स्थापित किया.
अक्षय कुमार और साल 2007: अगर 90 के दशक में संघर्ष की नींव रखी गई थी, तो सफलता की इमारत 2007 में बनी. यह साल बॉलीवुड के इतिहास में अक्षय कुमार के नाम से दर्ज है. यह वह समय था जब अक्षय ने एक ही साल में चार बड़ी फिल्में दीं, जो सभी सुपरहिट या ब्लॉकबस्टर रहीं. यह रिकॉर्ड आज भी किसी खान के नाम नहीं है. 2007 में अक्षय कुमार ने अकेले ही बॉक्स ऑफिस पर चार बैक-टू-बैक ब्लॉकबस्टर फिल्मों (‘नमस्ते लंदन’, ‘हे बेबी’, ‘भूल भुलैया’ और ‘वेलकम’) से कब्जा कर लिया, और खुद को बॉलीवुड का नंबर वन सुपरस्टार बना लिया.
अक्षय कुमार को ‘साइलेंट वॉरियर’ इसलिए भी कहा जा सकता है, क्योंकि वे कभी भी पार्टी में शामिल नहीं होते. उनका डिसिप्लिन (सुबह 4 बजे उठना, रात 9 बजे सोना और साल में चार फिल्में देना) इंडस्ट्री के दूसरे एक्टर्स के लिए एक सीख है. जहां दूसरे स्टार्स साल में एक फिल्म पर काम करने के लिए महीनों की छुट्टी लेते थे, वहीं अक्षय अपनी रफ्तार से डिस्ट्रीब्यूटर्स और प्रोड्यूसर्स के खजाने भरते रहे.
2007 के बाद भी अक्षय नहीं रुके. उन्होंने ‘हाउसफुल’ और ‘राउडी राठौर’ जैसी फिल्मों और फिर ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ और ‘पैडमैन’ जैसी सामाजिक फिल्मों से अपनी पहचान बनाए रखी. 2026 तक उनके सफर में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उनके टिके रहने की कला ने उन्हें आज भी सबसे आगे रखा है. वह बॉलीवुड के अकेले ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने खान्स से मुकाबला किया है और एक अनोखा रास्ता बनाया है जहां वे अकेले किंग हैं.

