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शोर-शराबा तेजी से बढ़ते शहरों में ध्वनि प्रदूषण का कारण बन रहा है. रोजाना ऐसे माहौल में रहने पर भले ही लोगों को इसकी आदत पड़ रही है लेकिन सीके बिरला अस्पताल की ईएनटी डॉक्टर दीप्ति सिन्हा के अनुसार, इससे तनाव, ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारियां, नींद की समस्या और सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है.

ज्यादा शोरगुल में रहने से हेल्थ पर खराब असर पड़ता है.
Noise Pollution Effects on Health: आजकल भागदौड़ के साथ-साथ जिंदगी में एक और चीज घुल-मिल गई है और वह है शोर-शराबा. कई रिसर्च बताती हैं कि हमारे आसपास ध्वनि प्रदूषण न केवल तेजी से बढ़ रहा है बल्कि हमारे जीवन में शामिल भी होता जा रहा है. खासतौर पर मेट्रो शहरों में सड़कों के किनारे बने घर और ऑफिसों में यह समस्या बेहद आम है.पहले के मुकाबले अब लोगों को ज्यादा शोर या आवाजों में रहने की भले ही आदत होती जा रही है, लेकिन ये चीज शरीर में 5 खतरनाक बदलाव ला रही है.
सीके बिरला अस्पताल दिल्ली की प्रमुख कंसल्टेंट ईएनटी डॉ. दीप्ति सिन्हा बताती हैं कि तेजी से बढ़ते शहरों में युवा लोग लगातार शोर के संपर्क में रह रहे हैं चाहे वह ऑफिस का माहौल हो या बाहर की सड़कें. ध्वनि प्रदूषण का मतलब है ऐसे तेज या परेशान करने वाले शोर, जो ट्रैफिक, निर्माण कार्य, मशीनों या भीड़भाड़ वाली जगहों से आते हैं. शहरों के विस्तार और कामकाजी जगहों के शोर बढ़ने के साथ यह एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनता जा रहा है.
शहरों का शोर सिर्फ असुविधा नहीं है, बल्कि यह शरीर और दिमाग दोनों पर असर डालता है. लगातार तेज आवाज सुनने से शरीर में तनाव (स्ट्रेस) बढ़ता है. इससे तनाव वाले हार्मोन बढ़ सकते हैं, ब्लड प्रेशर ऊंचा हो सकता है और लंबे समय में दिल की बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है. खुले ऑफिस, फैक्ट्री या ज्यादा ट्रैफिक वाले इलाकों में काम करने वाले युवाओं पर इसका असर ज्यादा होता है.
शोर का सबसे बड़ा असर नींद पर पड़ता है. जिन इलाकों में आवाज 65 डेसिबल से ज्यादा रहती है, वहां रहने वाले लोग अक्सर अच्छी नींद नहीं ले पाते. रात में बार-बार नींद खुलना, थकान और दिनभर सुस्ती महसूस होना आम बात है. खराब नींद से तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ता है और काम की क्षमता भी घटती है.
लगातार शोर सुनने से सुनने की क्षमता भी कम हो सकती है. 70 डेसिबल से ज्यादा आवाज में लंबे समय तक रहने से कान के अंदर की नाज़ुक नसों को नुकसान पहुंच सकता है. इससे धीरे-धीरे सुनाई कम देना या कानों में सीटी जैसी आवाज (टिनिटस) की समस्या हो सकती है.
इसके अलावा, लगातार शोर दिमाग की एकाग्रता और मूड पर भी असर डालता है. लंबे समय तक शोर में रहने से चिंता बढ़ सकती है और जीवन की गुणवत्ता कम हो सकती है.
इस समस्या से बचने के लिए शहरों की बेहतर योजना, ऑफिस में कम शोर वाला माहौल, घर में साउंडप्रूफिंग और नियमित स्वास्थ्य जांच जैसे कदम उठाना जरूरी है.
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प्रिया गौतम Hindi.News18.com में बतौर सीनियर हेल्थ रिपोर्टर काम कर रही हैं. इन्हें पिछले 14 साल से फील्ड में रिर्पोर्टिंग का अनुभव प्राप्त है. इससे पहले ये हिंदुस्तान दिल्ली, अमर उजाला की कई लोकेशन…और पढ़ें