हार्ट सर्जरी के बाद क्या पेशेंट तैराकी, साइकिलिंग कर पाएंगे? डॉक्टर ने बताई दिल को सूकून देने वाली बात

हार्ट सर्जरी के बाद क्या पेशेंट तैराकी, साइकिलिंग कर पाएंगे? डॉक्टर ने बताई दिल को सूकून देने वाली बात


जयपुर: हार्ट सर्जरी के बाद लोगों को डॉक्टर रिलैक्स रहने की सलाह देते हैं. साथ ही पेशेंट को कोई भी हार्ड वर्क करने से मना कर देते हैं. ऐसे में हार्ट सर्जरी के बाद पेशेंट तैराकी, साइकिल चलाने जैसी इच्छाओं को अंदर ही दबाने को मजबूर हो जाते हैं. लेकिन अब हार्ट सर्जरी के बाद भी पेशेंट इन सारे शौक को पूरा कर पाएंगे.

10 से 12 हफ्ते में पेशेंट पूरा कर सकेंगे शौक

सीनियर कार्डियोथोरेसिक सर्जन ने बताया है कि दिल की सर्जरी करवाने वाले कई मरीज़, अपनी रिकवरी और दिल के काम करने की क्षमता के आधार पर, लगभग 10 से 12 हफ़्तों में पूरी तरह से एथलेटिक गतिविधियों, जैसे तैराकी, साइकिल चलाना और यहां तक कि मैराथन दौड़ने जैसी गतिविधियों पर वापस लौट सकते हैं.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ हार्ट लंग डिज़ीज़ रिसर्च सेंटर (IHLD) के चेयरमैन, डॉ. राहुल चंदोला ने कहा कि हार्ट सर्जरी का मकसद सिर्फ़ मरीज़ की जान बचाना नहीं है. इसका मकसद यह पक्का करना है कि मरीज़ सुरक्षित रूप से एक सेहतमंद और सक्रिय ज़िंदगी में वापस लौट सकें, और कभी-कभी तो वे दोबारा मैराथन भी दौड़ सकें.

कार्डियक सर्जरी के कुछ दिन बाद पेशेंट व्यायाम शुरू कर पाएंगे

जब उनसे पूछा गया कि क्या दिल की सर्जरी के बाद सच में मैराथन दौड़ना मुमकिन है, तो उन्होंने कहा कि यह मरीज़ों का एक आम सवाल होता है और इसका जवाब है – हां.

डॉ. राहुल चंदोला ने कहा- ‘आधुनिक कार्डियक सर्जरी का मुख्य मकसद ही मरीज़ों को पूरी तरह से सेहतमंद और सक्रिय ज़िंदगी में वापस लाना है. ज़्यादातर सामान्य दिल की सर्जरी के बाद, कुछ ही दिनों में हल्की-फुल्की गतिविधियां और चलना-फिरना शुरू हो जाता है. सर्जरी के लगभग एक से दो हफ़्ते बाद मध्यम स्तर का व्यायाम शुरू किया जा सकता है, और उसके बाद के हफ़्तों में धीरे-धीरे ज़्यादा व्यवस्थित शारीरिक प्रशिक्षण भी शुरू हो जाता है.’

उन्होंने कहा, ‘लगभग 10 से 12 हफ़्तों में, कई मरीज़ अपनी रिकवरी और दिल के काम करने की क्षमता के आधार पर, पूरी तरह से एथलेटिक गतिविधियों पर वापस लौट सकते हैं.’ अगर डॉक्टर के दावों को सही मानें तो दौड़ना, तैराकी, साइकिल चलाना, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और यहां तक कि मैराथन दौड़ने जैसी गतिविधियां भी, एक बार घाव भरने और रीहैबिलिटेशन (पुनर्वास) की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद, सुरक्षित रूप से दोबारा शुरू की जा सकती हैं.

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि रिकवरी का समय दिल की सर्जरी के प्रकार, दिल के काम करने की क्षमता, कुल मिलाकर शारीरिक फ़िटनेस और किसी विशेषज्ञ की देखरेख में होने वाले कार्डियक रीहैबिलिटेशन पर निर्भर करता है.

हार्ट सर्जरी का मकसद पेशेंट को नॉर्मल जिंदगी लौटाना

डॉ. चंदोला ने कहा, ‘दिल की सर्जरी के बारे में सबसे बड़ी गलतफ़हमियों में से एक यह है कि मरीज़ों को अपनी शारीरिक गतिविधियों पर हमेशा के लिए रोक लगा देनी चाहिए. असल में, आधुनिक कार्डियक सर्जरी का मकसद ही मरीज़ों को एक पूरी तरह से सक्रिय और सामान्य ज़िंदगी में वापस लाना है.’

उन्होंने कहा कि आजकल, सामान्य कार्डियक सर्जरी करवाने वाले ज़्यादातर मरीज़ों को पांच से सात दिनों के भीतर अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है, और कई युवा मरीज़ तो चौथे ही दिन घर चले जाते हैं. जब वे अस्पताल से निकलते हैं, तब तक वे बिना किसी सहारे के चलने-फिरने लगते हैं और अपने रोज़मर्रा के सामान्य काम भी खुद ही करने लगते हैं.

दिल और फेफड़ों के ट्रांसप्लांट सर्जन ने बताया कि सही रिकवरी और रीहैबिलिटेशन की मदद से, कई मरीज़ नियमित व्यायाम, जैसे चलना, साइकिल चलाना, तैराकी और यहां तक कि लंबे समय तक चलने वाली शारीरिक गतिविधियों पर भी वापस लौट आते हैं.

30 की उम्र के बाद रेगुलर कराएं हार्ट चेकअप

डॉ. चंदोला ने बताया कि इंस्टीट्यूट ऑफ़ हार्ट एंड लंग डिज़ीज़ में, हम ‘iLive Connect’ के ज़रिए मरीज़ों की रिकवरी प्रक्रिया को अस्पताल की चारदीवारी से बाहर तक ले जाते हैं. यह प्लेटफ़ॉर्म IoT-कनेक्टेड मॉनिटरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स को मिलाकर काम करता है, ताकि शारीरिक मापदंडों को लगातार ट्रैक किया जा सके और मरीज़ के सामान्य स्तर से किसी भी शुरुआती बदलाव का पता लगाया जा सके. अगर कोई चिंताजनक रुझान दिखाई देता है, तो यह सिस्टम क्लिनिकल टीम को अलर्ट करता है.

इससे शारीरिक बदलावों की शुरुआती पहचान, तुरंत मेडिकल मदद, कम जटिलताएं और अस्पताल में दोबारा भर्ती होने की घटनाओं में कमी आती है. साथ ही, घर पर ठीक होने के दौरान मरीज़ों को आत्मविश्वास और तसल्ली भी मिलती है.

डॉ. चंदोला ने इस बात पर ज़ोर दिया कि दिल से जुड़ी बीमारियों की रोकथाम के लिए स्क्रीनिंग ज़्यादातर लोगों की सोच से कहीं पहले शुरू हो जानी चाहिए. 30 साल की उम्र के बाद, दिल से जुड़ी बीमारियों के जोखिम का शुरुआती आकलन करवाना उचित है, और 40 साल की उम्र के बाद, दिल की जांच को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लेना चाहिए.



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