Site icon Aaj Ki Baat

50 साल पुराना वो मास्टरपीस, कहलाई भारत की पहली ‘गे लव स्टोरी’, मशहूर नॉवेल पर बनी है ‘बदनाम बस्ती’

50 साल पुराना वो मास्टरपीस, कहलाई भारत की पहली ‘गे लव स्टोरी’, मशहूर नॉवेल पर बनी है ‘बदनाम बस्ती’


Last Updated:

साल 1971 में रिलीज हुई ‘बदनाम बस्ती’ बड़ी अजीब फिल्म है, जो लेखक कमलेश्वर के उपन्यास पर आधारित है. दो पुरुषों और एक महिला के लव ट्रायंगल पर बनी यह फिल्म सीमित रिलीज के बाद भारत से पूरी तरह गायब हो गई थी. साल 2019 में इसका एक भूला-बिसरा 35एमएम प्रिंट अचानक बर्लिन के एक आर्काइव में मिला. डिजिटल रूप से रीस्टोर होने के बाद इस मास्टरपीस को बर्लिन फिल्म फेस्टिवल (2020) और मुंबई फिल्म फेस्टिवल (MAMI) में दिखाया गया. इस ऐतिहासिक फिल्म ने नई पीढ़ी को भारतीय ‘LGBTQ+’ सिनेमा के शुरुआती दौर से रूबरू कराया.

नई दिल्ली: क्या आप जानते हैं कि समलैंगिकता पर बनी भारत की पहली फिल्म आज से करीब 55 साल पहले ही बन चुकी थी? साल 1971 में आई इस फिल्म का नाम था ‘बदनाम बस्ती’. प्रेम कपूर के निर्देशन में बनी यह फिल्म समाज के हाशिए पर जीने वाले दो पुरुषों और एक महिला के बीच के लव ट्रायंगल को दिखाती है, जिसे हिंदी के मशहूर लेखक कमलेश्वर के पहले उपन्यास ‘एक सड़क सत्तावन गलियां’ पर बनाया गया था.

हैरानी की बात यह है कि अपनी रिलीज के कुछ ही समय बाद यह फिल्म अचानक इतिहास के पन्नों से गायब हो गई. सिनेमाघरों में इसे बहुत कम स्क्रीन्स मिलीं और धीरे-धीरे लोग इसके बारे में भूल गए. यहां तक कि ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन सिनेमा’ में भी इसका कोई जिक्र नहीं मिलता और भारत के राष्ट्रीय फिल्म पुरालेख (NFAI) के पास भी इसका कोई प्रिंट सुरक्षित नहीं बचा था.

कहानी में ट्विस्ट साल 2019 में आया, जब बर्लिन के ‘आर्सेनल इंस्टीट्यूट फॉर फिल्म एंड वीडियो आर्ट’ में इस फिल्म का एक 35एमएम प्रिंट मिला. यह आज भी एक रहस्य है कि यह प्रिंट जर्मनी कैसे पहुंचा. अंदाजा लगाया जाता है कि 1970 के दशक की शुरुआत में इसे किसी फिल्म फेस्टिवल के लिए वहां भेजा गया होगा और यह कभी वापस नहीं लौट पाया.

Add News18 as
Preferred Source on Google

जर्मनी में मिला यह प्रिंट काफी अच्छी स्थिति में था. इसके बाद, फिल्म को डिजिटल रूप से रीस्टोर (सुधारा) किया गया, जिससे इसकी अनोखी और बोल्ड कहानी को आज के दौर के दर्शकों के लिए सहेजने में मदद मिली. यह फिल्म छोटे शहरों में पुरुषों की चाहत, उनके रिश्तों और मर्दानगी के बंधनों को बहुत ही बेबाकी और संजीदगी के साथ पर्दे पर उतारती है.

रीस्टोरेशन के बाद इस फिल्म ने केवल सरकारी दफ्तरों की अलमारियों में जगह नहीं बनाई, बल्कि ग्लोबल लेवल पर अपनी एक नई पहचान बनाई. यह वो दौर था जब पूरी दुनिया में एशियाई क्वीर सिनेमा को लेकर लोगों की दिलचस्पी और समझ काफी बढ़ रही थी और ‘बदनाम बस्ती’ ने इस मंच पर दमदार वापसी की.

दशकों तक इस फिल्म को संभालकर रखने वाले शहर बर्लिन में ही इसका पहला बड़ा मॉडर्न री-डेब्यू हुआ. साल 2020 में आयोजित हुए 70वें बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के ‘फोरम सेक्शन’ में इस फिल्म की स्क्रीनिंग की गई, जहां दुनिया भर के सिनेमा प्रेमियों ने भारत की इस ऐतिहासिक फिल्म को खूब सराहा.

इस मास्टरपीस को अमेरिका के ‘द ब्लॉक म्यूजियम ऑफ आर्ट’ (नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी) में ‘छिपे हुए इतिहास’ को दिखाने वाले एक खास प्रोग्राम के तहत प्रदर्शित किया गया. ग्लोबल लेवल पर तारीफें बटोरने के बाद फिल्म भारत में भी चर्चा का विषय बन गई और लोग इसके महत्व को समझने लगे.

आखिरकार, मुंबई फिल्म फेस्टिवल के जरिए इस फिल्म की भारत में वापसी हुई. इस स्क्रीनिंग ने भारत की नई पीढ़ी के फिल्ममेकर्स और एक्टिविस्ट्स को यह देखने का मौका दिया कि आज के मॉडर्न LGBTQ+ सिनेमा की नींव हमारे देश में कितनी पहले ही रखी जा चुकी थी.

न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।



Source link

Exit mobile version