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Kota Railway Division TB Awareness Workshop: विश्व क्षय रोग दिवस के अवसर पर पश्चिम मध्य रेलवे के कोटा मंडल में एक विशेष जागरूकता कार्यशाला का आयोजन किया गया. मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुपूर्णा सेन रोय के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम में टीबी के लक्षणों और उपचार पर विस्तृत चर्चा की गई. पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. ब्रजमोहन ने बताया कि लगातार खांसी, बुखार और वजन कम होना टीबी के संकेत हो सकते हैं और समय पर जांच से यह बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है. वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक सौरभ जैन ने इसे रेलवे की जन-जागरूकता मुहिम का हिस्सा बताया. कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने हवा के जरिए फैलने वाले इस संक्रमण से बचाव के तरीके साझा किए और लोगों से लक्षणों को नजरअंदाज न करने की अपील की. अपर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुषमा भटनागर ने स्वस्थ जीवनशैली पर जोर देते हुए सभी का आभार जताया. इस कार्यशाला का उद्देश्य कोटा रेल मंडल के कर्मचारियों और आमजन को टीबी मुक्त भारत अभियान से जोड़ना था.

कोटा रेल मंडल में विश्व क्षय रोग दिवस के अवसर पर आयोजित इस विशेष जागरूकता कार्यशाला में टीबी (Tuberculosis) के लक्षणों और समय पर उपचार के महत्व पर जोर दिया गया. चिकित्सा विशेषज्ञों ने बताया कि यदि किसी व्यक्ति को तीन सप्ताह से अधिक समय तक लगातार खांसी, बुखार या बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होने जैसी समस्या हो रही है, तो यह टीबी के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. मंडल रेल चिकित्सालय के बहिरंग विभाग (OPD) में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य रेलवे कर्मचारियों और उनके परिजनों को इस गंभीर बीमारी के प्रति सचेत करना था. कार्यशाला में बड़ी संख्या में चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ ने भाग लिया और इस बात पर चर्चा की कि कैसे सही समय पर जाँच और नियमित दवाइयों के सेवन से टीबी को पूरी तरह जड़ से खत्म किया जा सकता है. इस दौरान मरीजों और उनके परिजनों को सरकारी स्तर पर मिलने वाली निःशुल्क उपचार सुविधाओं और पोषण सहायता योजनाओं के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई.

यह कार्यशाला मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुपूर्णा सेन रोय के कुशल मार्गदर्शन में आयोजित की गई. कार्यक्रम का प्राथमिक उद्देश्य आम जनमानस और रेल कर्मचारियों के बीच टीबी के प्रति फैली भ्रांतियों को दूर करना और उन्हें बीमारी के शुरुआती लक्षणों के प्रति जागरूक करना था. विशेषज्ञों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में समय पर सटीक जांच और डॉक्टर की सलाह अनुसार नियमित उपचार लेने से टीबी पूरी तरह साध्य है. चिकित्सकों ने आगाह किया कि लक्षणों को नजरअंदाज करना या बीच में दवा छोड़ना इस बीमारी को और भी गंभीर और जानलेवा बना सकता है. जागरूकता ही इस बीमारी को समाज से जड़ से मिटाने की पहली सीढ़ी है, और इसी दिशा में कोटा मंडल द्वारा यह सराहनीय प्रयास किया गया है.

वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक सौरभ जैन ने इस अवसर पर कहा कि रेलवे प्रशासन समय-समय पर ऐसे स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करता रहता है. इन आयोजनों का मुख्य उद्देश्य रेल यात्रियों और आमजन को गंभीर बीमारियों के प्रति सचेत करना और उन्हें स्वस्थ जीवनशैली के लिए प्रेरित करना है. उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि टीबी जैसी बीमारी के पूर्ण उन्मूलन के लिए जनभागीदारी अत्यंत आवश्यक है. बिना सामूहिक प्रयासों और जागरूकता के इस बीमारी को समाज से खत्म करना संभव नहीं है. इसलिए, रेल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग मिलकर समाज के हर वर्ग तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं ताकि टीबी मुक्त भारत के संकल्प को साकार किया जा सके.
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मुख्य वक्ता और पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. ब्रजमोहन ने कार्यशाला के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य साझा किया कि विश्व में टीबी का सबसे अधिक बोझ भारत पर है. इसी कारण इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना और भी आवश्यक हो जाता है. उन्होंने विस्तार से समझाया कि टीबी एक संक्रामक बीमारी है जो संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने के दौरान हवा के जरिए दूसरे व्यक्ति तक पहुँच सकती है. डॉ. ब्रजमोहन ने टीबी के प्रमुख लक्षणों को पहचानना बहुत जरूरी बताया, जिनमें लगातार खांसी, रात में बुखार और पसीना आना, बलगम में खून की मौजूदगी, बिना कारण वजन कम होना और अत्यधिक थकान महसूस होना शामिल हैं. उन्होंने जनता से पुरजोर अपील की कि यदि इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो बिना देरी किए तुरंत चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए.

कार्यक्रम के समापन पर अपर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुषमा भटनागर ने सभी उपस्थित जनों का आभार व्यक्त किया. उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाना किसी भी बीमारी से लड़ने की पहली सीढ़ी है. डॉ. भटनागर ने लोगों से भावुक अपील करते हुए कहा कि टीबी के लक्षणों को कभी भी हल्के में न लें या उन्हें नजरअंदाज न करें. उन्होंने जोर देकर कहा कि समय पर सटीक जांच और डॉक्टर द्वारा निर्धारित पूरा उपचार न केवल मरीज की जान बचाता है, बल्कि समाज के अन्य लोगों को भी संक्रमित होने से सुरक्षित रखता है. इस बीमारी के विरुद्ध छिड़ी जंग में हर नागरिक की सक्रिय भागीदारी और जागरूकता ही टीबी मुक्त भारत के सपने को साकार कर सकती है.