आर्टेमिस-II ने अपोलो-13 का गलती से बना रिकॉर्ड तोड़ा:चांद पर जाते समय ऑक्सीजन टैंक फट गया था, मुश्किल से बची थी एस्ट्रोनॉट्स की जान

आर्टेमिस-II ने अपोलो-13 का गलती से बना रिकॉर्ड तोड़ा:चांद पर जाते समय ऑक्सीजन टैंक फट गया था, मुश्किल से बची थी एस्ट्रोनॉट्स की जान




11 अप्रैल 1970। चांद पर उतरने के मकसद से अमेरिका ने अपोलो-13 मिशन लॉन्च किया। तीन एस्ट्रोनॉट चांद कि तरफ तेजी से बढ़ रहे थे। लेकिन इस दौरान कुछ ऐसा हुआ कि तीनों एस्ट्रोनॉट को बचाने के लिए ग्राउंड कंट्रोल टीम बेहद जटिल रेस्क्यू मिशन चलाना पड़ा। यान पृथ्वी से 400171 किमी दूर पहुंच गया जो एक वर्ल्ड रिकॉर्ड था। कल 6 अप्रैल को रात 11:26 बजे आर्टेमिस II मिशन के 4 एस्ट्रोनॉट्स ने इस रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। इस स्टोरी में अपोलो-13 मिशन की पूरी कहानी। आखिर कैसे एक रेस्क्यू मिशन से वर्ल्ड रिकॉर्ड बना… अपोलो-13 की कहानी को समझने के लिए एक बार इस जानकारी से गुजर जाएं… अपोलो 13 स्पेसक्राफ्ट मुख्य रूप से तीन मॉड्यूल्स से मिलकर बना था: अचानक ऑक्सीजन टैंक नंबर 2 फट गया 13 अप्रैल 1970। अपोलो 13 मिशन को लॉन्च हुए 56 घंटे बीत चुके थे। कमांडर जेम्स ए. लवेल जूनियर, लूनर मॉड्यूल पायलट फ्रेड डब्ल्यू और कमांड मॉड्यूल पायलट जॉन एल. स्विगर्ट इसमें सवार थे। स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी से 3.20 लाख कमी दूर पहुंच चुका था। क्रू इस यान के लैंडिंग मॉड्यूल ‘एक्वेरियस’ की जांच कर रहे थे। अगले दिन अपालो 13 को चांद की कक्षा में प्रवेश करना था। लवेल और हाइस चांद पर चलने वाले पांचवें और छठे इंसान बनने वाले थे। तभी अचानक सर्विस मॉड्यूल का ऑक्सीजन टैंक 2 फट गया। क्रू को लूनर मॉड्यूल में जाने का निर्देश मिला ऑक्सीजन, बिजली और पानी की सप्लाई बंद हो गई। लवेल ने मिशन कंट्रोल को रिपोर्ट किया। उन्होंने कहा- “ह्यूस्टन यहां एक समस्या हो गई है। कमांड मॉड्यूल से ऑक्सीजन लीक हो रही थी और फ्यूल सेल्स तेजी से खत्म हो रहे थे। चांद पर उतरने का मिशन रद्द हो गया। धमाके के एक घंटे बाद, मिशन कंट्रोल ने क्रू को लूनर मॉड्यूल में जाने का निर्देश दिया। इसमें काम चलाने लायक ऑक्सीजन थी। इस मॉड्यूल को केवल अंतरिक्ष यात्रियों को कक्षा में घूम रहे कमांड मॉड्यूल से चांद की सतह तक ले जाने और वापस लाने के लिए बनाया गया था। पानी का कोटा घटाकर पांचवां हिस्सा कर दिया इसकी पावर सप्लाई सिर्फ दो लोगों के लिए 45 घंटे तक चलने लायक थी। अगर अपालो 13 के क्रू को जिंदा धरती पर लौटना था, तो इस लेंडिंग मॉड्यूल को तीन लोगों का बोझ कम से कम 90 घंटे तक उठाना था। अंतरिक्ष में 3 लाख किमी से ज्यादा का रास्ता पार करना था। ऊर्जा बचाने के लिए क्रू ने पानी का कोटा घटाकर पांचवां हिस्सा कर दिया। केबिन का तापमान जमा देने वाली ठंड से बस कुछ ही डिग्री ऊपर रखा। कमांड मॉड्यूल के चौकोर लिथियम हाइड्रोक्साइड कैनिस्टर, लूनर मॉड्यूल के सिस्टम के गोल छेद में फिट नहीं बैठ रहे थे। इसका मतलब था कि कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालना एक बड़ी समस्या थी। मिशन कंट्रोल ने यान में मौजूद चीजों की मदद से एक जुगाड़ू अडैप्टर तैयार किया। अपोलो के क्रू ने उनके मॉडल को कॉपी कर लिया। इसमें लगा नेविगेशन सिस्टम भी बहुत ही साधारण था। 15 अप्रैल को अपोलो 13 ने पृथ्वी से दूरी का रिकॉर्ड बनाया 14 अप्रैल को अपालो 13 ने चांद का चक्कर लगाया। स्विगर्ट और हाइस ने तस्वीरें लीं और लवेल ने सबसे कठिन मैनुअर के बारे में मिशन कंट्रोल से बात की। यह पांच मिनट का इंजन बर्न था, जिससे LM को इतनी रफ्तार मिल सके कि वह ऊर्जा खत्म होने से पहले घर लौट आए। चांद के पिछले हिस्से का चक्कर लगाने के दो घंटे बाद, क्रू ने लैंडिंग मॉड्यूल के छोटे डिसेंट इंजन को चालू किया। अपालो 13 घर वापसी की राह पर था। 15 अप्रैल 1970 को अपालो 13 चांद के पिछले हिस्से में उसकी सतह से 254 किमी और पृथ्वी की सतह से 4,00,171 किमी दूर था। मिशन कंट्रोल को यान की हीट शील्ड खराब होने का डर था 17 अप्रैल को कमांड मॉड्यूल चालू किया गया। पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने से एक घंटे पहले लैंडिंग मॉड्यूल को कमांड मॉड्यूल से अलग किया गया। दोपहर करीब 1 बजे यान ने पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश किया। मिशन कंट्रोल को यान की हीट शील्ड खराब होने का डर था। उन्होंने क्रू से बिना किसी रेडियो संपर्क के चार मिनट इंतजार किया। फिर, अपालो 13 के पैराशूट दिखाई दिए। तीनों अंतरिक्ष यात्री सुरक्षित रूप से प्रशांत महासागर में उतर गए। इस तरह गलती से इस मिशन में वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बना और तीनों अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी पर भी लौट आएं।
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