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India’s Generic Weight Loss Drugs: भारत में जल्द वेट लॉस की जेनेरिक दवाएं आने लगेंगी. इससे डायबिटीज और मोटापे के इलाज में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. इससे सेमाग्लूटाइड जैसी दवाएं काफी सस्ती हो जाएंगी और अधिकतर लोग इन्हें अफॉर्ड कर पाएंगे. हालांकि वेट लॉस की दवाओं का गलत इस्तेमाल होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

भारत में सेमाग्लूटाइड दवा का पेटेंट खत्म हो रहा है और 40 कंपनियां जेनेरिक वर्जन लॉन्च करने की तैयारी में हैं.
Generic Semaglutide in India: पिछले कुछ सालों में वेट लॉस की दवा ओजेम्पिक और मोनजारो की खूब चर्चा हुई है. ये दवाएं दुनिया के कई देशों में डायबिटीज और मोटापे के मरीजों के लिए वरदान साबित हो रही हैं. देश में भी ये दवाएं उपलब्ध हैं और कई लोग फायदा उठा रहे हैं. हालांकि ओजेम्पिक और मोनजारो जैसी दवाओं की कीमत ज्यादा है. एक मोटा अनुमान लगाएं, तो फिलहाल इन दवाओं की पूरी डोज के लिए लोगों को एक महीने में 8 से 9 हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं. मगर अब ये दवाएं बेहद सस्ती होने वाली हैं. जी हां, अगले सप्ताह भारत में सेमाग्लूटाइड दवा पर पेटेंट समाप्त हो जाएगा और कई कंपनियां इनका जेनेरिक वर्जन तैयार कर सकेंगी. फिलहाल देश में 40 से अधिक दवा कंपनियों अपना ब्रांड लॉन्च करने की तैयारी में हैं. यह डेवलपमेंट वेट लॉस और डायबिटीज के इलाज में एक गेमचेंजर साबित हो सकता है.
भारत ने पहले भी ऐसी स्थिति देखी है. जब डापाग्लिफ्लोजिन (Dapagliflozin) जैसी डायबिटीज की दवा का पेटेंट खत्म हुआ था, तो बाजार में कई जेनेरिक ब्रांड आ गए थे. कुछ ही समय में करीब 100 ब्रांड उपलब्ध हो गए. शुरुआत में थोड़ी उलझन रही, लेकिन डॉक्टर्स ने धीरे-धीरे भरोसेमंद कंपनियों की दवाओं को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया. इससे यह साबित होता है कि भारतीय मेडिकल सिस्टम समय के साथ खुद को संतुलित कर लेता है. हालांकि सेमाग्लूटाइड एक सामान्य दवा नहीं है. यह एक जटिल पेप्टाइड है, जो प्रोटीन जैसी संरचना वाला अणु होता है. इसे बनाना और इसकी गुणवत्ता बनाए रखना साधारण टैबलेट की तुलना में कहीं ज्यादा कठिन होता है. यह दवा इंजेक्शन और ओरल दोनों रूप में आती है, इसलिए इसकी डोज, शुद्धता और असर पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है. निर्माण में छोटी सी गलती भी इसके असर को प्रभावित कर सकती है.
इस दवा के लिए कोल्ड-चेन यानी ठंडे तापमान में सुरक्षित रखने की जरूरत होती है. फैक्ट्री से लेकर मरीज तक पहुंचने तक इसे 2°C से 8°C के बीच रखना जरूरी है. अगर तापमान में गड़बड़ी होती है, तो दवा की प्रभावशीलता कम हो सकती है. इसलिए इतनी बड़ी संख्या में ब्रांड्स आने के बाद इन सभी में समान क्वालिटी बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी. इसी वजह से मजबूत सुरक्षा नियम बेहद जरूरी हैं. सबसे पहले हर दवा को सख्त गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को पूरा करना होगा. इसके साथ ही बाजार में आने के बाद भी दवाओं की निगरानी जरूरी है, ताकि किसी भी साइड इफेक्ट या खराब गुणवत्ता को समय रहते पकड़ा जा सके. दूसरी बात डॉक्टर्स को इस दवा के सही इस्तेमाल की ट्रेनिंग देना जरूरी है, क्योंकि सभी डॉक्टर इस नई दवा के बारे में पूरी तरह अनुभवी नहीं हो सकते.
तीसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस दवा का इस्तेमाल केवल डॉक्टर की सलाह से ही होना चाहिए. सेमाग्लूटाइड को सिर्फ कॉस्मेटिक वजन घटाने के लिए इस्तेमाल करना खतरनाक हो सकता है. यह एक गंभीर मेटाबोलिक थेरेपी है, जिसे सही जांच और जरूरत के आधार पर ही दिया जाना चाहिए. इसके कुछ साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं, जैसे मतली, पेट की समस्या, पित्ताशय की बीमारी और पैंक्रियाटाइटिस. ऐसे में बिना जानकारी के इसका उपयोग जोखिम भरा हो सकता है. जब दर्जनों कंपनियां एक साथ जटिल इंजेक्शन दवाएं बनाएंगी, तो उनकी निगरानी के लिए मजबूत फार्माकोविजिलेंस सिस्टम की जरूरत होगी. अगर सही नियम और जागरूकता के साथ इस बदलाव को लागू किया जाए, तो सेमाग्लूटाइड जेनेरिक्स भारत में डायबिटीज और मोटापे के इलाज में एक मील का पत्थर साबित हो सकते हैं. अगर सावधानी नहीं बरती गई, तो यह अवसर जोखिम में भी बदल सकता है.
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अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें