41 मिनट पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र
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डायरेक्टर विजय भट्ट ने चाइल्ड आर्टिस्ट बेबी महजबीं को मीना नाम दिया था।
मीना कुमारी की जिंदगी जितनी चमकदार पर्दे पर दिखी, उतनी ही दर्द और संघर्ष से भरी असलियत में रही। जन्म लेते ही पिता द्वारा अनाथालय की सीढ़ियों पर छोड़ दिए जाने से शुरू हुई उनकी कहानी ने महज चार साल की उम्र में ही उन्हें परिवार का सहारा बनने पर मजबूर कर दिया। आगे चलकर फिल्मी दुनिया में नाम कमाने के बावजूद उनका निजी जीवन तकलीफों से भरा रहा।
‘बैजू बावरा’, ‘साहिब बीबी और गुलाम’ और ‘पाकीजा’ जैसी फिल्मों में अपने शानदार अभिनय से उन्होंने दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। लेकिन पर्दे की इस चमक के पीछे उनकी जिंदगी दर्द, अकेलेपन और टूटे रिश्तों से घिरी रही। कमाल अमरोही के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट और उनके सहायक द्वारा थप्पड़ मारने जैसी घटनाओं ने उनके भीतर के दर्द को और गहरा किया। यही पीड़ा उनके अभिनय में झलकी और उन्हें ट्रेजेडी क्वीन बना गई।
31 मार्च 1972 को महज 38 साल की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी अदाकारी और शायरी आज भी जीवित है। उनकी जिंदगी इस बात की मिसाल है कि सच्ची कला अक्सर गहरे दर्द और अनुभवों से जन्म लेती है।
आज मीना कुमारी की 54वीं पुण्यतिथि है, आइए जानते हैं हिंदी सिनेमा की ट्रेजेडी क्वीन के जीवन से जुड़े कुछ और खास किस्से..
पैदा होते ही पिता अनाथालय में छोड़ आए
मीना कुमारी का जन्म 1 अगस्त 1933 को मुंबई (तब बॉम्बे) में हुआ था। उनका बचपन का नाम महजबीं बानो था। उनका जन्म पिता अली बख्श़ के लिए निराशाजनक था क्योंकि वे पुत्र चाहते थे। मीना कुमारी परिवार में दूसरी बेटी थीं, उनकी दो बहनें थीं।
बड़ी बहन खुर्शीद जूनियर और छोटी बहन महलीका (मधु), जो बाल कलाकार और अभिनेता महमूद की पत्नी थीं। जब महजबीं का जन्म हुआ, तब उनके पिता को डॉक्टर की फीस देने के पैसे नहीं थे, और उन्हें अनाथालय की सीढ़ियों पर छोड़ दिया, लेकिन कुछ ही समय बाद अब उन्हें पछतावा हुआ तो बेटी को वापस लाए।
टैगोर खानदान से रहा है रिश्ता
मीना कुमारी के पिता, मास्टर अली बख्श़, भेरा (अब पाकिस्तान) से आए एक सुन्नी मुस्लिम थे, जो रंगमंच के कलाकार, हारमोनियम वादक और उर्दू कवि थे। उनकी माता, इकबाल बेगम (मूल नाम प्रभावती देवी), उत्तर प्रदेश के मेरठ की थीं और बंगाली परिवार से संबंध रखती थीं। उन्होंने विवाह के बाद इस्लाम धर्म अपनाया।
मीन कुमारी की नानी, हेम सुंदरी टैगोर, रवींद्रनाथ टैगोर के दूर के चचेरे रिश्तेदार की बेटी थीं। उन्होंने अपने पति के निधन के बाद मेरठ जाकर नर्सिंग की और प्यारे लाल शाकिर मेरठी से शादी की, जिससे मीना कुमारी की माता प्रभावती पैदा हुई।
चार साल की उम्र में ही परिवार का सहारा बनीं
मीना कुमारी को फिल्मी करियर में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। वे बचपन से ही पढ़ना चाहती थीं, लेकिन घर की हालत इतनी खराब थी कि चार साल की उम्र में उन्हें परिवार का पेट पालने के लिए फिल्मों में काम करना पड़ा। उनके माता-पिता उन्हें शूटिंग के लिए फिल्म स्टूडियो ले जाने लगे।
उन्हें नियमित स्कूल में दाखिला मिला, लेकिन काम की व्यस्तता के कारण पढ़ाई बाधित रही। उन्होंने अपनी शिक्षा मुख्य रूप से निजी ट्यूशन और स्व-अध्ययन से पूरी की।
चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर करियर की शुरुआत
डायरेक्टर विजय भट्ट ने मीना कुमारी को फिल्म ‘लेदरफेस’ (1939) में एक बाल कलाकार के रूप में कास्ट किया। यही उनका फिल्मी सफर बेबी महजबीं के नाम से शुरू हुआ। पहले दिन उन्हें 25 रुपए का भुगतान किया गया। बहुत कम उम्र में ही वे बख्श़ परिवार की मुख्य कमाई का स्रोत बन गई थीं।
1962 में फिल्मफेयर को दिए गए एक इंटरव्यू में मीना कुमारी ने बताया था कि चार साल की उम्र से ही अपने माता-पिता का सहारा बनने से उन्हें अपार संतुष्टि मिली।
बेबी महजबीं से बनीं बेबी मीना
चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर पर मीना कुमारी ने अधूरी कहानी (1939), पूजा(1940), एक ही भूल(1940), नई रोशनी(1941), विजय (1942), लाल हवेली( 1944) जैसी कई फिल्मों में काम किया। वे कई बार सेट पर इतनी भावुक हो जाती थीं कि रोती थीं, लेकिन जैसे ही कैमरा ऑन होता, उनका अभिनय अपने भीतर की पीड़ा की ताकत के साथ सामने आता था।
यही सच्ची संवेदना और गहराई उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाती थी। फिल्म ‘एक ही भूल की’ शूटिंग के दौरान डायरेक्टर विजय भट्ट ने मीना कुमारी का नाम बेबी महजबीं से बेबी मीना कर दिया। बाद में यही नाम मीना कुमारी के नाम से फेमस हुआ।
13 साल की उम्र में हीरोइन बनीं
2 मई 1946 में रिलीज फिल्म ‘बच्चों का खेल’ से 13 साल की उम्र में हीरोइन बन कर आईं और बेबी मीना से मीना कुमारी बन गईं। बैजू बावरा (1952) से मीना कुमारी ने अपनी पहचान बनाई। इसमें उनका किरदार गौरी लोगों के दिलों में उतर गया और फिल्म 100 हफ्तों तक चली।
इसके लिए उन्हें पहला फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार मिला। इसके बाद ‘दायरा’ और ‘परिनीता’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय को और पहचान दिलाई। ‘परिनीता’ में उन्होंने भारतीय नारी की आम जिंदगी की कठिनाइयों को प्रभावशाली ढंग से दिखाया।
फिल्म ‘शारदा’ से मिला ट्रैजेडी क्वीन का खिताब
1954-56 के बीच मीना कुमारी ने समाज और ऐतिहासिक कहानियों पर आधारित फिल्मों में काम किया, जिसमें ‘चांदनी चौक’, ‘एक ही रास्ता’, ‘अद्ल-ए-जहांगीर’, ‘हलाकू’, और ‘आजाद’ जैसी फिल्में प्रमुख रही हैं। दिलीप कुमार के साथ उनकी फिल्म ‘आजाद’ दर्शकों में बेहद लोकप्रिय हुई।
1957 में फिल्म शारदा ने मीना कुमारी को ट्रैजेडी क्वीन बना दिया। उनके साहस और अभिनय के लिए उन्होंने पहला बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन अवार्ड जीता। इसके बाद की फिल्मों जैसे ‘सहारा’, ‘यहूदी’, ‘फरिश्ता’, ‘चिराग कहां रोशनी कहां’, ने उन्हें लगातार सफलता दिलाई।
‘साहिब बीबी और गुलाम’ (1962) में उनके अभिनय ने उन्हें चार फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाए और यह भारत की ऑस्कर प्रविष्टि भी बनी। इसके बाद उन्होंने ‘प्रीत पराई’, ‘कोहिनूर’, ‘भाभी की चूड़ियां’, ‘फूल और पत्थर’ जैसी यादगार फिल्मों में काम किया। 1972 में उनकी अंतिम रिलीज ‘गोमती के किनारे’ और ‘पाकीजा’ थी। ‘पाकीजा’ में उनके प्रदर्शन ने उन्हें मरणोपरांत भी फिल्म फेयर नामांकन दिलाया।
सिर्फ अदाकारा ही नहीं, एक बेहतरीन पार्श्व गायिका भी थीं
मीना कुमारी सिर्फ अदाकारा ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन पार्श्व गायिका भी थीं। बचपन में उन्होंने 1945 तक ‘बहन’ जैसी फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में अपनी आवाज दी। बाद में नायिका बनने के बाद उन्होंने ‘दुनिया एक सराय’ (1946), ‘पिया घर आजा’ (1948), ‘बिछड़े बालम’ (1948) और ‘पिंजरे के पंछी’ (1966) जैसे गीतों को भी अपनी आवाज दी।
इतना ही नहीं, उन्होंने ‘पाकीजा’ के लिए भी गाया था, हालांकि वह गीत फिल्म में इस्तेमाल नहीं किया गया और बाद में ‘पाकीजा -रंग बा रंग’ (1977) एल्बम में जारी किया गया।
कमाल अमरोही से पहली मुलाकात
मीना कुमारी का करियर जितना महान था, उतना ही जीवन संघर्ष ने प्रभावित किया। उनके जीवन का यह चैप्टर तब शुरू हुआ जब उनकी जिंदगी में कमाल अमरोही की एंट्री हुई।
1951 में फिल्म ‘तमाशा’ के सेट पर 18 वर्षीय मीना कुमारी की मुलाकात प्रसिद्ध निर्देशक कमाल अमरोही से हुई। ‘महल’ की सफलता के बाद, कमाल अपनी अगली फिल्म ‘अनारकली’ के लिए नायिका की तलाश में थे। मीना के अभिनय को देखकर उन्होंने उन्हें मुख्य भूमिका के लिए राजी कर लिया।
सड़क दुर्घटना में घायल, कमाल अमरोही से बढ़ीं नजदीकियां
21 मई 1951 को महाबलेश्वर के पास मीना कुमारी एक सड़क दुर्घटना की शिकार हो गईं। इसके कारण उनका बायां हाथ हमेशा के लिए चोटिल हो गया और वे दो महीने तक ससून अस्पताल में भर्ती रहीं। दुर्घटना के अगले ही दिन कमाल अमरोही मीना का हालचाल जानने पहुंचे।
मीना कुमारी ‘अनारकली’ में काम न कर पाने के दुख में थीं। कमाल ने उनके हाथ पर फिल्म के आगे ‘मेरी’ लिखकर स्थिति संभाली और दोनों के बीच निकटता बढ़ी।
पिता को बिन बताए निकाह किया
14 फरवरी 1952 को 19 वर्षीय मीना कुमारी ने 34 वर्षीय कमाल अमरोही से अपने परिवार और मित्रों की मौजूदगी में निकाह किया। उनके पिता को इस शादी की जानकारी नहीं थी। दरअसल, 14 फरवरी 1952 को मीना कुमारी के पिता अली बख्श उन्हें और उनकी बहन मधु को फिजियोथेरेपी क्लीनिक छोड़ गए। पिता के जाते ही कमाल अमरोही अपने मित्रों के साथ क्लीनिक पहुंचे और मीना कुमारी से निकाह कर लिया।
पिता ने तलाक लेने का दबाव डालना शुरू किया
मीना निकाह के बाद अपने घर आ गईं। इसके बाद दोनों पति-पत्नी रात-रात भर बातें करने लगे, जिसे एक दिन एक नौकर ने सुन लिया। जिसे एक दिन एक नौकर ने सुन लिया। इसके बाद पिता ने मीना पर कमाल से तलाक लेने का दबाव डालना शुरू किया।
मीना ने तय किया कि तब तक वे कमाल के साथ नहीं रहेंगी, जब तक पिता को दो लाख रुपए न दे दें। पिता ने फिल्मकार महबूब खान को उनकी फिल्म ‘अमर’ के लिए मीना की डेट्स दे दीं, लेकिन मीना ‘अमर’ की जगह पति कमाल अमरोही की फिल्म ‘दायरा’ में काम करना चाहती थीं।
इस पर पिता ने चेतावनी दी कि अगर वे पति की फिल्म में काम करने जाएंगी, तो उनके लिए घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएँगे। पांच दिन अमर की शूटिंग के बाद मीना ने फिल्म छोड़ दी और ‘दायरा’ की शूटिंग करने चली गईं। उस रात पिता ने उन्हें घर में नहीं आने दिया और मजबूरी में मीना पति के घर चली गईं। अगले दिन अखबारों में इस डेढ़ साल से छुपी शादी की खबर ने खूब सुर्खियां बटोरीं।
शादी के बाद कमाल ने रखीं शर्तें
कमाल ने मीना को फ़िल्मी करियर जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन शर्त रखी कि वे अपने मेकअप रूम में किसी पुरुष को नहीं बुलाएंगी। केवल उनके मेकअप आर्टिस्ट को बुलाएंगी और हर शाम 6:30 बजे तक अपनी कार से ही घर लौटेंगी। सेट पर उनका नियंत्रण और निगरानी भी होती थी। मीना कुमारी शुरुआत में सहमत थीं, लेकिन धीरे-धीरे इन शर्तों का पालन नहीं किया।
मीना के कार्यक्रमों में कमाल अमरोही नहीं जाते थे
कमाल अमरोही अक्सर मीना के कार्यक्रमों और समारोहों में साथ नहीं जाते थे। 1963 में ‘साहिब बीबी और गुलाम’ को बर्लिन फिल्म समारोह में भारतीय प्रविष्टि के रूप में चुना गया। तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री सत्य नारायण सिन्हा ने दो टिकटों की व्यवस्था की।
एक मीना के लिए और दूसरा उनके पति के लिए, लेकिन कमाल अमरोही ने यात्रा से इंकार कर दिया। प्रीमियर पर मीना अकेले गईं।
मीना कुमारी ने अपनी शादी में शारीरिक शोषण का सामना किया। लेखक विनोद मेहता के अनुसार, छह अलग-अलग स्रोतों से यह पुष्टि हुई कि मीना वास्तविक रूप से पीड़ित थीं। नरगिस ने भी उनके दर्द का उल्लेख अपनी चिठ्ठी में किया।
नरगिस ने 1972 में शमा नाम की एक मैगजीन में मीना कुमारी के लिए उर्दू में एक चिट्ठी लिखी थी। यह चिट्ठी अब किताब ‘’ये उन दिनों की बात है, उर्दू मेमॉर्स ऑफ सिनेमा लेजेंड्स’’’ का हिस्सा है।
कमाल अमरोही के सहायक ने थप्पड़ मारा
कमाल के सहायक बाकर अली ने मीना को थप्पड़ मारा जब उन्होंने गुलजार को मेकअप रूम में प्रवेश दिया। दरअसल, मीना कुमारी ‘नाज’ नाम से शायरी लिखती थीं और गुलजार से अपने जज्बात साझा करती थीं। उसी सिलसिले में गुलजार मीना कुमारी से मिलने गए थे। बहरहाल, कमाल ने सीधे हस्तक्षेप नहीं किया, जिससे मीना का गुस्सा और बढ़ गया। वे नाराज होकर बहन मधु के घर चली गईं।
कमाल ने उन्हें वापस लाने की कोशिश की, लेकिन मीना ने उनसे बात करने से मना कर दिया। इस घटना ने पहले से तनावपूर्ण संबंध को पूरी तरह तोड़ दिया।
मीना कुमारी सिर्फ फिल्मों की एक अभिनेत्री नहीं थीं, वे जागरूक शायरा भी थीं। उन्होंने ‘नाज’ के नाम से शायरी लिखी, जिसमें उनका भीतरी दर्द, तन्हाई, प्यार की चाह, और जीवन की पीड़ा झलकती थी।
अलगाव के बाद मीना कुमारी अक्सर अकेलेपन, निराशा और पीड़ा का सामना करती थीं। बहुत से लोगों का मानना है कि यही अकेलापन बाद में उन्हें शराब की ओर ले गया, जो उनके स्वास्थ्य पर भारी पड़ा। समय के साथ उनका स्वास्थ्य काफी बिगड़ता गया, और कयास हैं कि अलगाव और व्यक्तिगत संघर्ष ने उन्हें अंदर‑ही‑अंदर तोड़ दिया। उन्होंने शराब का सहारा लेना शुरू किया, परंतु यह उनकी हालत को और खराब करने लगा।
जब उनकी आख़िरी फिल्म पाकीजा अंततः 4 फरवरी 1972 में रिलीज हुई, जिसे उनके पति कमाल अमरोही ने डायरेक्ट की थी। इस फिल्म के पूरा होने में 14 साल लगे थे। उन्हें उसके परिणाम देखने के लिए जिंदगी नहीं मिली। वह 28 मार्च 1972 को बीमार पड़ीं, और 31 मार्च 1972 को लीवर सिरोसिस के कारण केवल 38 वर्ष की उम्र में दुनिया से विदा हो गयीं।
उनकी अंतिम इच्छा के रूप में उनके ताबूत पर यह पंक्तियां खुद उन्होंने लिखवाईं:
“She ended life with a broken fiddle, with a broken song, with a broken heart, but not a single regret.”
(मतलब, उसने टूटी हुई बांसुरी, टूटा हुआ गीत, टूटा हुआ दिल लेकर जीवन समाप्त किया, लेकिन एक भी पछतावा नहीं)
यह पंक्तियां उनके जिन्दगी के संघर्ष, भावनात्मक गहराई और जीवनदर्शिता का सबसे संवेदनशील प्रतिबिंब हैं।
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