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- Trump Thanks Reliance & India For $25 Lakh Crore Investment In US Oil Refinery
वॉशिंगटन1 दिन पहले
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रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अमेरिका में ऑयल रिफाइनरी बनाने के लिए डील की है। अमेरिका में पिछले 50 सालों में यह पहली नई ऑयल रिफाइनरी होगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 11 मार्च को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर इसकी जानकारी दी।
ट्रम्प ने कहा कि यह 300 अरब डॉलर यानी, करीब 27 लाख करोड़ रुपए की एक ऐतिहासिक डील है। उन्होंने कहा कि यह अमेरिकी वर्कर्स, हमारे एनर्जी सेक्टर और साउथ टेक्सस के शानदार लोगों की बहुत बड़ी जीत है। रिलायंस के निवेश लिए उन्होंने धन्यवाद दिया।

ब्राउनविले में बनेगी दुनिया की सबसे ‘क्लीन’ रिफाइनरी
डोनाल्ड ट्रम्प के मुताबिक, यह रिफाइनरी साउथ टेक्सस के ‘पोर्ट ऑफ ब्राउनविले’ में बनाई जाएगी। यह पूरी तरह से अमेरिकी शेल तेल पर चलेगी। 27 लाख करोड़ रुपए की जो डील बताई गई है वो 20 साल की व्यापारिक गतिविधि का अनुमानित मूल्य है। वास्तविक निर्माण लागत 4 से 5 अरब डॉलर यानी करीब 46 हजार करोड़ रुपए होगी।
इस रिफाइनरी का भूमि-पूजन इस साल की दूसरी तिमाही में प्रस्तावित है। रिफाइनरी की क्षमता 1.6 लाख बैरल प्रतिदिन होगी। अमेरिका में आखिरी बड़ी रिफाइनरी 1977 में लुइसियाना में बनी थी।
ट्रम्प ने दावा किया कि यह दुनिया की सबसे साफ रिफाइनरी होगी।इस प्रोजेक्ट से अमेरिका के घरेलू बाजारों को ईंधन मिलेगा, नेशनल सिक्योरिटी मजबूत होगी और हजारों की संख्या में नई नौकरियां पैदा होंगी।
ट्रम्प ने कहा कि रिलायंस का यह निवेश उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति, टैक्स में कटौती और परमिट प्रक्रिया को आसान बनाने की वजह से मुमकिन हो पाया है।
3 बड़ी ताकत… जिससे रिलायंस को डील मिली
- अलग-अलग क्रूड रिफाइन करने की क्षमता: अमेरिका की समस्या रिफाइन करने में है। रिलायंस जामनगर रिफाइनरी का नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स 21.1 है, अमेरिकी रिफाइनरी का औसत 10-12 है। जामनगर में 216 तरह के तेल की रिफाइनिंग संभव।
- रिफाइनरी का सबसे ज्यादा अनुभव: गुजरात के जामनगर में स्थित रिलायंस का रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स दुनिया का सबसे बड़ा है, जिसकी क्षमता 12.4 लाख बैरल प्रतिदिन है। रिफाइनरी बनाने और चलाने का सबसे ज्यादा अनुभव रिलायंस को है।
- अमेरिकी रिफाइनरी सक्षम नहीं हैं: अमेरिका में 132 सक्रिय तेल रिफाइनरी हैं, जिनकी संयुक्त क्षमता करीब 1.84 करोड़ बैरल प्रतिदिन है। ये वेनेजुएला और कनाडा जैसे देशों के भारी, उच्च-सल्फर कच्चे तेल को रिफाइन करने के लिए बनी थीं, न कि उस हल्के कच्चे तेल के लिए जो आज अमेरिकी शेल उत्पादन में प्रमुख है।

वो बड़े फायदे… जो भारत और अमेरिका को होंगे
अमेरिका को ये 3 बड़े फायदे होंगे-
- नई रिफाइनिंग क्षमता: यह नई रिफाइनरी उसकी घरेलू ईंधन आपूर्ति मजबूत करेगी। वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पकड़ बढ़ाएगी।
- रोजगार के अवसर: इससे टेक्सास में हजारों प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे।
- लाइट शेल ऑयल का उपयोग: अमेरिका के पास ‘लाइट शेल ऑयल’ का विशाल भंडार है। यह रिफाइनरी विशेष रूप से इसी तेल को प्रोसेस करने के लिए बन रही है।
भारत व रिलायंस के लिए 3 फायदे-
- ग्लोबल एनर्जी प्लेयर: रिलायंस अब केवल एक भारतीय रिफाइनर नहीं, बल्कि एक ‘ग्लोबल एनर्जी सुपरपावर’ बन जाएगी।
- सप्लाई चेन पर नियंत्रण: दो दशकों तक ईंधन की खरीद, प्रोसेसिंग, बिक्री का पूरा नियंत्रण मिलेगा। इससे राजस्व भी बढ़ेगा।
- भू-राजनीतिक लाभ: यह भारत-अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों को गहरा करेगी। ऊर्जा में इतनी बड़ी साझेदारी भारत को वैश्विक मंच पर भी बड़ी मजबूती देगी।
नॉलेज बॉक्स: 50 साल से अमेरिका में रिफाइनरी क्यों नहीं बनी?
अमेरिका में सख्त पर्यावरण नियमों, पुराने प्लांट्स के विस्तार पर फोकस और भारी लागत के चलते 1970 के दशक के बाद से किसी नई कंपनी ने रिफाइनरी नहीं लगाई थी। रिलायंस का वहां जाकर प्लांट लगाना भारतीय कंपनियों के बढ़ते ग्लोबल रसूख को दर्शाता है।
‘विकसित’ संपन्न अमेरिका 50 साल से खुद यह काम क्यों नहीं कर पाया? इसके पीछे ये 4 बड़े कारण जिम्मेदार हैं:
- पर्यावरण नियम: नई रिफाइनरी के लिए परमिट पाने में 10-15 साल लगते हैं।
- भारी लागत: $4-5 अरब डॉलर का जोखिम उठाने को कोई तैयार नहीं था।
- कम मुनाफा: मार्जिन बहुत कम होता है।
- भविष्य का डर: इलेक्ट्रिक वाहनों के आने से तेल की मांग घटने की आशंका।
भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट सेक्टर कंपनी है रिलायंस
रिलायंस भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट सेक्टर कंपनी है। ये अभी हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन, पेट्रोलियम रिफाइनिंग और मार्केटिंग, पेट्रोकेमिकल्स, एडवांस मटेरियल और कंपोजिट, रिन्यूएबल एनर्जी, डिजिटल सर्विस और रिटेल सेक्टर में काम करती है।
