Last Updated:
कुछ दिन पहले दिल्ली एम्स में आए एक मामले में बल्लभगढ़ की एक मरीज को इसलिए इलाज में देरी हुई क्योंकि उसके पास आयुष्मान भारत कार्ड था लेकिन हरियाणा के विभागों से मंजूरी न मिलने के चलते सर्जरी शुरू नहीं हो पाई थी. हालांकि एडवोकेट अशोक अग्रवाल ने इस मामले में मरीज की मदद की और कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद मरीज को इलाज मिल पाया. जानें स्कीम से इलाज की हकीकत..
अगर आपके पास आयुष्मान भारत कार्ड है तो क्या इलाज में देरी होती है?
‘कुछ दिन पहले बल्लभगढ़ के तिरखा कॉलोनी की गली नंबर 7 में रहने वाली महिला डॉली मंडल का एक मामला सामने आया. डॉली मंडल को एमेलोब्लास्टोमा बीमारी थी. यह जबड़े का एक रेयर लेकिन लोकल लेवल पर फैलने वाला ट्यूमर होता है जो हड्डी को खत्म कर देता है. अगर इसका तुरंत इलाज न किया जाए तो इससे इन्फेक्शन और चेहरे की बनावट खराब हो सकती है. उसने अपने आयुष्मान कार्ड के सहारे दिल्ली एम्स में में जबड़े की रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी कराने के लिये सर्म्पक किया. डॉक्टरों ने उसके जबड़े के बीमार हिस्से को हटाने और रिकंस्ट्रक्ट करने के लिए एक्सटेंडेड टोटल टेम्पोरोमैंडिबुलर जॉइंट रिप्लेसमेंट करने की सलाह दी और इसे मेडिकली अर्जेंट बताया गया. साथ ही डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि देरी से हालत तेज़ी से बिगड़ सकती है.’
‘डॉली के इस प्रोसीजर में इम्प्लांट्स सहित लगभग 2.5 लाख रुपये का खर्च आने के कारण उसका इलाज व ऑपरेशन नहीं हो पा रहा था. देरी के कारण उसको बहुत दर्द हो रहा था और वह ठोस खाना नहीं खा पा रही थी, लेकिन कार्ड होने के बावजूद कई कागजी कार्रवाई के चलते न केवल इलाज लेट हो रहा था बल्कि मरीज को भी काफी दिक्कतें हो रही थीं. इस दौरान महिला ने हरियाणा अभिभावक एकता मंच के प्रदेश महासचिव कैलाश शर्मा से मदद मांगी. कैलाश शर्मा ने मंच के राष्ट्रीय सलाहकार व सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ट एडवोकेट अशोक अग्रवाल से पीडित महिला का एम्स नई दिल्ली में जल्दी निशुल्क इलाज व ऑपरेशन कराने के लिये उचित कार्रवाई करने की अपील की.’
तब एडवोकेट अशोक अग्रवाल ने कानूनी कार्रवाई की वहीं दूसरी ओर हरियाणा में महिला की कागजी कार्रवाई शुरू हुई. इस दौरान एम्स की ओर से नियमों के तहत जरूरी डॉक्यूमेंट्स प्राप्त होने के बाद इलाज करने की मजबूरी भी बताई. हालांकि महिला का एम्स में ही इलाज हुआ और वह पूरी तरह ठीक भी हो गई.
इस बारे में एडवोकेट अशोक ने न्यूज18 हिंदी से बातचीत में कहा कि कानूनन मरीजों के इलाज में पेपरवर्क व एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोसेस के चलते देरी नहीं की जा सकती. हाई कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि किसी भी हालत में मेडिकल केयर में देरी नहीं होनी चाहिए, लेकिन उनके पास ऐसे बहुत सारे मरीज आते हैं जो जरूरी डॉक्यूमेंट और कागजी कार्रवाई के चक्कर में अस्पतालों के चक्कर काटते हैं और कष्ट झेलते हैं.
इस मामले में भी जो इलाज महिला का होना था, उसके लिए राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग से मंजूरी जरूरी थी, जिसमें काफी देर हो रही थी. कैशलेस इलाज के लिए अस्पताल तभी आगे बढ़ते हैं जब उन्हें इलाज का पैसा स्कीमों के तहत मिलने की कार्रवाई पूरी हो जाती है. उससे पहले मरीज को इलाज नहीं मिलता है. प्राइवेट अस्पतालों में स्थिति और भी ज्यादा खराब हो जाती है. सिर्फ आयुष्मान ही नहीं सीजीएचएस जैसी कई स्कीमों के तहत भी प्राइवेट अस्पताल कई बार मरीज को एडमिट करने से मना कर देते हैं, ऐसे कई मामले सामने आते हैं. जबकि बहुत सारे मरीजों को इलाज ही नहीं मिल पाता है.
एडवोकेट अशोक आगे कहते हैं कि प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना आयुष्मान भारत हेल्थ स्कीम के तहत एक तो जरूरतमंद व गरीबों का आयुष्मान कार्ड बनता नहीं है और अगर बन भी जाता है तो जरूरत पड़ने पर आयुष्मान कार्ड होल्डरों का इलाज ठीक से हो नहीं पाता है. प्राइवेट अस्पताल तो आयुष्मान कार्ड होल्डरों का इलाज करने से सीधा मना कर देते हैं पर कई बार देखा गया है कि सरकारी अस्पतालों में भी आयुष्मान कार्ड होल्डरों का इलाज ठीक से नहीं होता है, कई कागजी कार्रवाई में मरीज के इलाज में देरी की जाती है और इससे मरीज की जान भी चली जाती है जो नहीं होना चाहिए. इसके लिए जरूरी है कि गंभीर मरीजों के संदर्भ में इलाज की प्रक्रिया को कागजी कार्रवाई से पहले ही शुरू किए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए.
About the Author
प्रिया गौतम Hindi.News18.com में बतौर सीनियर हेल्थ रिपोर्टर काम कर रही हैं. इन्हें पिछले 14 साल से फील्ड में रिर्पोर्टिंग का अनुभव प्राप्त है. इससे पहले ये हिंदुस्तान दिल्ली, अमर उजाला की कई लोकेशन…और पढ़ें

