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केदार शर्मा फिल्म जगत में अपनी ‘लकी चवन्नी’ के लिए मशहूर थे. कहा जाता था कि वे जिस भी कलाकार के काम से खुश होकर उसे चवन्नी इनाम में देते, वह भविष्य का सुपरस्टार बन जाता था. उन्होंने राज कपूर, मधुबाला और गीता बाली जैसे दिग्गजों को पहला बड़ा मौका दिया. केदार शर्मा ने ‘चित्रलेखा’ और ‘नील कमल’ जैसी यादगार फिल्में बनाईं. सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें कई सम्मान मिले, लेकिन विडंबना यह रही कि ‘राज कपूर अवॉर्ड’ मिलने के ठीक एक दिन पहले 29 अप्रैल 1999 को उनका निधन हो गया.

नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा के मशहूर डायरेक्टर केदार शर्मा अपने कड़क मिजाज और नए टैलेंट को परखने की गजब की कला के लिए मशहूर थे. फिल्म इंडस्ट्री में उनकी एक चवन्नी का किस्सा आज भी बहुत मशहूर है. कहा जाता था कि अगर केदार शर्मा किसी कलाकार के काम से खुश होकर उसे अपनी जेब से इनाम में एक चवन्नी दे दें, तो उस कलाकार की किस्मत चमक जाती थी.(फोटो साभार: AI से जेनरेटेड इमेज)

12 अप्रैल 1910 को पंजाब में जन्मे केदार शर्मा का शुरुआती जीवन बहुत गरीबी और स्ट्रगल में बीता. उनके पिता चाहते थे कि बेटा मास्टर बने, लेकिन केदार के सिर पर तो फिल्मों का भूत सवार था. इसी जुनून में वे घर छोड़कर कोलकाता भाग आए. उन दिनों फिल्मों का सारा बड़ा काम कोलकाता में ही हुआ करता था, लेकिन वहां भी राह आसान नहीं थी.

शुरुआत में केदार को कोई ढंग का काम नहीं मिला, तो उन्होंने पोस्टर पेंट करने का काम पकड़ लिया. वे एक कमाल के पेंटर थे, इसलिए जल्द ही उन्होंने फिल्म निर्माण की बारीकियां भी सीख लीं. धीरे-धीरे उन्होंने कैमरे के पीछे हाथ आजमाया, छोटी-मोटी एक्टिंग की और फिर गाने और डायलॉग लिखने लगे. उनकी मेहनत रंग लाने लगी थी.
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साल 1936 में आई ‘देवदास’ उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बनी. उन्होंने इस फिल्म के डायलॉग और गाने ही लिखे थे, जो खूब हिट हुए. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और निर्देशन की दुनिया में कदम रखा. उन्होंने ‘चित्रलेखा’, ‘नील कमल’ और ‘बावरे नैन’ जैसी कई क्लासिक फिल्में इंडस्ट्री को दीं.

केदार शर्मा की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे हीरे की पहचान करना जानते थे. उन्होंने राज कपूर को तब मौका दिया, जब वे केवल एक क्लैपर बॉय थे. किसी ने सोचा भी नहीं था कि वह लड़का आगे चलकर ‘शोमैन’ बनेगा. राज कपूर के साथ-साथ उन्होंने 13 साल की मधुबाला को भी ‘नील कमल’ फिल्म से बड़ा ब्रेक दिया था.

गीता बाली, भारत भूषण और संगीतकार रोशन जैसे दिग्गजों को संवारने का श्रेय भी केदार शर्मा को ही जाता है. जब वे किसी के शॉट से खुश होते, तो उसे दुअन्नी या चवन्नी इनाम में देते थे. जल्द ही पूरी इंडस्ट्री में यह बात फैल गई कि ‘शर्मा जी की चवन्नी’ जिसके पास है, उसका बड़ा सितारा बनना तय है.

फिल्मों के साथ-साथ केदार शर्मा ने बच्चों के लिए भी बेहतरीन सिनेमा बनाया. उन्होंने बाल फिल्म सोसायटी के लिए ‘जलदीप’ जैसी फिल्में बनाईं, जिन्हें देश-विदेश में काफी तारीफ मिली. उनके योगदान के लिए उन्हें कई अवॉर्ड्स से नवाजा गया. दिलचस्प बात यह है कि उन्हें मिलने वाला ‘राज कपूर अवॉर्ड’ राज कपूर के ही गुरु को मिलने जा रहा था.

29 अप्रैल 1999 को इस महान कलाकार का निधन हो गया. हैरानी की बात यह रही कि जिस ‘राज कपूर अवॉर्ड’ से उन्हें सम्मानित किया जाना था, उसे मिलने से ठीक एक दिन पहले उन्होंने आखिरी सांस ली. आज भले ही केदार शर्मा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्मों और ‘लकी चवन्नी’ के किस्सों में वे हमेशा जिंदा रहेंगे.