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कैप्सूल रंग-बिरंगे क्यों होते हैं? लाल, नीला, पीला होने की क्या है वजह, अधिकतर लोग नहीं जानते ये 5 रोचक तथ्य

कैप्सूल रंग-बिरंगे क्यों होते हैं? लाल, नीला, पीला होने की क्या है वजह, अधिकतर लोग नहीं जानते ये 5 रोचक तथ्य


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Reasons Behind Colorful Capsules: अक्सर आपने देखा होगा कि बीमारियां ठीक करने वाले कैप्सूल अलग-अलग रंगों के होते हैं. कैप्सूल का रंग-बिरंगा होना सेफ्टी और विज्ञान का एक हिस्सा है. ये रंग मरीजों को दवाओं के बीच अंतर करने, सक्रिय तत्वों को रोशनी से बचाने और निर्माण प्रक्रिया को आसान बनाने में मदद करते हैं.

कैप्सूल के अलग-अलग रंगों के पीछे वैज्ञानिक वजह होती हैं.

Why Are Capsules Colored: जब भी हम बीमार होते हैं, तो डॉक्टर कई तरह की गोलियां और कैप्सूल प्रिस्क्राइब करते हैं. अधिकतर कैप्सूल रंग-बिरंगे होते हैं. कभी कैप्सूल का रंग लाल होता है, तो कुछ कैप्सूल नीले-पीले या हरे रंग के होते हैं. कई बार कैप्सूल दो रंगों का होता है. इन रंगों को देखकर कई बार सोच में पड़ जाते हैं. कभी आपने सोचा है कि इन कैप्सूलों को लाल, नीला, पीला या दो अलग-अलग रंगों का क्यों बनाया जाता है? क्या यह कैप्सूल को अट्रैक्टिव दिखाने के लिए होता है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक वजह है? चलिए कैप्सूल के इन रंगों के पीछे छिपे कुछ तथ्य जान लेते हैं, जो आपको हैरान कर देंगे.

अमेरिकन फार्मास्युटिकल्स कंपनी SED फार्मा की रिपोर्ट के मुताबिक कैप्सूल के अलग-अलग रंग दवा की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए होते हैं. दवाओं में मौजूद कई सक्रिय तत्व फोटोसेंसिटिव होते हैं. आसान भाषा में कहें तो ये तत्व सूरज की रोशनी या अल्ट्रा-वायलेट किरणों के संपर्क में आते ही खराब होने लगते हैं. ऐसे में गहरे रंगों वाले कैप्सूल शेल दवा को एक सुरक्षा कवच की तरह प्रोटेक्ट करते हैं और हानिकारक किरणों को अंदर जाने से रोकते हैं. इससे दवा की प्रभावशीलता बनी रहती है. रंगीन कैप्सूल अपने अंदर मौजूद पाउडर या ग्रेन्यूल्स के अजीब दिखने वाले रंग को भी छिपा लेते हैं, जिससे मरीज को दवा लेने में मानसिक रूप से असहजता महसूस नहीं होती है. कैप्सूल के अलग-अलग रंगों का वैज्ञानिक रूप से काफी महत्व है.

कैप्सूल के अलग-अलग रंगों का एक कारण मरीजों की सेफ्टी है. अस्पतालों या घरों में एक साथ कई दवाइयां चलती हैं. ऐसे में रंगों के माध्यम से दवाओं के बीच अंतर करना आसान हो जाता है. यह जीवन रक्षक प्रणाली की तरह काम करता है, ताकि गलती से एक की जगह दूसरी दवा न ले ली जाए. इसके अलावा कंपनियां अक्सर एक ही दवा की अलग-अलग डोज को पहचानने के लिए अलग रंगों का उपयोग करती हैं. उदाहरण के लिए 250 mg और 500 mg के कैप्सूल के रंग अलग रखे जाते हैं, ताकि ओवरडोज या अंडरडोज की भूल को रोका जा सके. फार्मासिस्ट भी रंग, आकार और उन पर छपे कोड के जरिए ही यह सुनिश्चित करते हैं कि मरीज को सही प्रिस्क्रिप्शन दिया जा रहा है. इससे दवाओं को पहचानने में काफी आसानी होती है.

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फार्मास्युटिकल कंपनियां दवा बनाने में कलर साइकोलॉजी का भी उपयोग करती हैं. हमारा दिमाग अनजाने में कुछ रंगों को कुछ विशेष इफेक्ट से जोड़कर देखता है. उदाहरण के लिए लाल, नारंगी या चटकीले रंग अक्सर स्टिम्युलेंट्स या पेन किलर्स के लिए उपयोग किए जाते हैं, क्योंकि ये एनर्जी और शक्ति का संकेत देते हैं. नीला या हरा रंग अक्सर नींद की गोलियों या तनाव कम करने वाली दवाओं में इस्तेमाल होता है, क्योंकि ये रंग शांति और सुकून का अहसास कराते हैं. कई रिसर्च बताती हैं कि अगर दवा का रंग उसके असर से मेल खाता है, तो मरीज को ट्रीटमेंट के प्रति ज्यादा सकारात्मक और बेहतर महसूस होता है.

मार्केटिंग की दुनिया में रंगों का बहुत बड़ा रोल है और दवाओं की दुनिया भी इससे अछूती नहीं है. दवा कंपनियां अपनी एक खास पहचान बनाने के लिए विशिष्ट रंगों का पेटेंट कराती हैं. ओवर-द-काउंटर दवाओं के मामले में लोग अक्सर नाम से ज्यादा रंगों से अपनी भरोसेमंद दवा को पहचानते हैं. इसके अलावा,कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए भी रंग जरूरी हैं. जेनेरिक दवा बनाने वाली कंपनियों के लिए अक्सर यह अनिवार्य होता है कि वे अपनी दवाओं का रंग ब्रांडेड दवाओं से अलग रखें, ताकि ट्रेडमार्क का उल्लंघन न हो. इस तरह रंग किसी दवा को एक ब्रांड वैल्यू प्रदान करते हैं.

कई बार आपने गौर किया होगा कि कई कैप्सूल दो अलग-अलग रंगों के होते हैं. इसके पीछे एक बहुत ही व्यावहारिक मैन्युफैक्चरिंग यूटिलिटी छिपी है. कैप्सूल के दो भाग होते हैं- एक बॉडी, जिसमें दवा भरी जाती है और दूसरा कैप, जो ढक्कन का काम करता है. निर्माण के दौरान स्वचालित मशीनों और मैनुअल असेंबली में कर्मियों के लिए यह पहचानना आसान हो जाता है कि कौन सा हिस्सा बॉडी है और कौन सा कैप. अलग-अलग रंग होने से दवा भरने की प्रक्रिया तेज हो जाती है और गलत फिटिंग की संभावना खत्म हो जाती है. यह साधारण सा दिखने वाला अंतर उत्पादन की पूरी चेन को सुव्यवस्थित बनाता है.

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अमित उपाध्याय

अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें



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