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गाजियाबाद के अशोक राणा और उनके परिवार के लिए पिछले 13 साल दर्दनाक इंतजार से कम नहीं रहे. उनका बेटा हरीश एक हादसे के बाद ऐसी हालत में पहुंच गया, जहां वह जिंदा तो था, बेजान से कम नहीं. उसकी सांसें चलती रही हैं, दिल धड़कता रहता है, लेकिन वह अपने आसपास की दुनिया से पूरी तरह कट गया. न बोल सकता है न सुन सकता है और न ही किसी बात को समझ सकता है. गाजियाबाद स्थित यशोदा अस्पताल के डॉ. संदीप जैन लोकल 18 से बताते हैं कि परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट ऐसी स्थिति होती है जिसमें मरीज का शरीर तो जिंदा रहता है लेकिन उसकी सोचने-समझने की क्षमता लगभग खत्म हो जाती है.
हादसे के बाद से ही हरीश राणा पूरी तरह परिवार और मेडिकल सपोर्ट पर निर्भर हो गए. उन्हें ट्यूब के जरिए खाना दिया जाता और दवाइयां भी उसी तरह दी जातीं. कई बार वह आंखें खोलते जरूर, लेकिन किसी को पहचान नहीं पाते और न ही किसी तरह की प्रतिक्रिया दे पाते. परिवार के लिए यह स्थिति बेहद भावुक और कठिन है. एक तरफ उनका बेटा उनके सामने है लेकिन वह उससे बात नहीं कर सकते और न ही वह कुछ समझ सकता है.
लंबे समय तक चले इस संघर्ष के बाद पिता अशोक राणा ने अपने बेटे की हालत को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगी. उन्होंने अदालत से कहा कि उनका बेटा पिछले 13 वर्षों से ऐसी हालत में है जहां उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है और वह लगातार पीड़ा भरी जिंदगी जी रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले को सुनने के बाद आखिरकार उन्हें बुधवार को इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी. इस फैसले के बाद यह मामला देशभर में चर्चा का विषय बन गया है. गाजियाबाद स्थित यशोदा अस्पताल के डॉ. संदीप जैन बताते हैं कि परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट ऐसी स्थिति होती है जिसमें मरीज का शरीर तो जिंदा रहता है लेकिन उसकी सोचने-समझने की क्षमता लगभग खत्म हो जाती है. मरीज को अपने आसपास क्या हो रहा है इसका कोई अहसास नहीं होता. वह खुद से कोई काम नहीं कर सकता और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है.
और क्या-क्या
डॉ. संदीप जैन के अनुसार, जब किसी व्यक्ति के सिर में गंभीर चोट लगती है तो कई बार दिमाग के अहम हिस्से को नुकसान पहुंच जाता है. ऐसे में दिमाग के कुछ हिस्से सिर्फ शरीर को जिंदा रखने का काम करते हैं लेकिन सोचने-समझने और प्रतिक्रिया देने की क्षमता खत्म हो जाती है. कई मामलों में ऐसे मरीजों के ठीक होने की संभावना बेहद कम रह जाती है. लंबे समय तक लाइफ सपोर्ट पर रहने वाले मरीजों को कई दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है.
बढ़ जाती हैं दूसरी परेशानियां
डॉ. संदीप जैन के मुताबिक, ऐसे मरीजों में फेफड़ों में संक्रमण, यूरिन इन्फेक्शन, बेड सोर और शरीर में कई तरह के संक्रमण का खतरा बना रहता है. मरीज इन तकलीफों को महसूस तो कर सकता है लेकिन किसी को बता नहीं पाता. किसी भी हादसे के बाद शुरुआती एक घंटा बेहद अहम होता है जिसे गोल्डन ऑवर कहा जाता है. अगर इस समय के भीतर सही इलाज मिल जाए तो मरीज के बचने और ठीक होने की संभावना काफी बढ़ जाती है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को कई विशेषज्ञ एक महत्त्वपूर्ण कदम मान रहे हैं जिससे गंभीर और असाध्य स्थिति में पड़े मरीजों के परिवारों के सामने एक कानूनी विकल्प का रास्ता खुला है.
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Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें

