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न आम, न तरबूज…उत्तराखंड की गर्मियों का साथी ये नन्हा फल, पहाड़ों पर इसके गाए जाते गीत

न आम, न तरबूज…उत्तराखंड की गर्मियों का साथी ये नन्हा फल, पहाड़ों पर इसके गाए जाते गीत


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Kafal Benefits : उत्तराखंड के पहाड़ों में गर्मियों के मौसम में मिलने वाला काफल इन दिनों लोगों की पहली पसंद बना हुआ है. गहरे लाल रंग का यह जंगली फल अपने खट्टे-मीठे स्वाद और औषधीय गुणों की वजह से काफी प्रसिद्ध है. काफल पकने का मतलब गर्मियों के आगमन. लोकगीत ‘काफल पाको मैनी चाखो’ ने इसे देशभर में पहचान दिलाई है. बागेश्वर के किशन मलड़ा लोकल 18 से बताते हैं कि काफल की खेती नहीं की जाती है. यह मध्य हिमालय के जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगता है.

काफल केवल फल नहीं बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं का अहम हिस्सा भी है. प्रसिद्ध लोकगीत ‘काफल पाको मैनी चाखो’ ने इसे देशभर में पहचान दिलाई है. पहाड़ों में यह गीत आज भी लोगों की जुबान पर रहता है. काफल पकने का मतलब गर्मियों के आगमन. इसी के साथ जंगलों में रौनक बढ़ने लगती है. गांवों में बच्चे और महिलाएं जंगलों में काफल तोड़ने जाते हैं, जो एक तरह की पारंपरिक गतिविधि बन चुकी है. कई मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी काफल जान है.

काफल को प्राकृतिक ऊर्जा देने वाला फल माना जाता है. गर्मियों में इसे खाने से शरीर को ताजगी और ठंडक मिलती है. इसमें मौजूद पोषक तत्व शरीर की कमजोरी दूर करने में मदद करते हैं. स्थानीय लोग लंबे समय से इसे पारंपरिक स्वास्थ्यवर्धक फल के रूप में उपयोग करते आए हैं. पहाड़ों में जंगलों से लौटते समय लोग काफल खाकर थकान मिटाते हैं. इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट शरीर को कई बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं. बिना किसी मिलावट और केमिकल के मिलने वाला काफल आज के समय में लोगों के लिए हेल्दी विकल्प बन चुका है.

गर्मियों के मौसम में काफल स्थानीय ग्रामीणों के लिए अच्छी आय का साधन बन जाता है. गांवों के लोग जंगलों से काफल इकट्ठा कर बाजारों में बेचते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी होती है. सड़क किनारे और स्थानीय बाजारों में काफल की अच्छी कीमत मिलती है. पर्यटक भी इसे खरीदने में काफी रुचि दिखाते हैं. कई परिवारों की मौसमी आय का बड़ा हिस्सा काफल बिक्री से आता है. खासकर महिलाओं और युवाओं को इससे रोजगार मिलता है. पहाड़ों में सीमित रोजगार के बीच यह जंगली फल लोगों के लिए आर्थिक सहारा बन रहा है. हर साल काफल सीजन का उन्हें बेसब्री से इंतजार रहता है.

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पिछले कुछ वर्षों में काफल की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है. पहले यह केवल पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित था, लेकिन अब शहरों में भी इसकी मांग बढ़ने लगी है. लोग इसे उत्तराखंड की पारंपरिक पहचान के रूप में पसंद कर रहे हैं. कई स्थानीय व्यापारी काफल को पैक करके दूसरे शहरों तक पहुंचा रहे हैं. सोशल मीडिया और पर्यटन के कारण भी इसकी पहचान मजबूत हुई है. गर्मियों में बाजारों में काफल की दुकानें लोगों को आकर्षित करती हैं. बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इसका स्वाद पसंद करते हैं. प्राकृतिक, स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक होने के कारण काफल आज उत्तराखंड के सबसे चर्चित जंगली फलों में शामिल हो गया है.

बागेश्वर के किशन मलड़ा लोकल 18 से बताते हैं कि काफल की सबसे खास बात यह है कि इसकी खेती नहीं की जाती है. यह मध्य हिमालय के जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला जंगली फल है. उत्तराखंड के बागेश्वर, अल्मोड़ा, नैनीताल और पिथौरागढ़ जिलों के जंगलों में यह बड़ी मात्रा में मिलता है. करीब 1500 से 2500 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में काफल के पेड़ अधिक पाए जाते हैं. ग्रामीण लोग हर साल मौसम आने पर जंगलों से काफल इकट्ठा करते हैं. पहाड़ों के पर्यावरण और जैव विविधता में भी इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है. बिना किसी रासायनिक खाद या दवा के उगने वाला यह फल पूरी तरह प्राकृतिक होता है.

बागेश्वर के चिकित्सक डॉ. ऐजल पटेल बताते हैं कि काफल केवल स्वादिष्ट फल ही नहीं बल्कि औषधीय गुणों का भी खजाना है. इसमें विटामिन सी, आयरन, कैल्शियम और एंटी-ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है. काफल पाचन तंत्र को मजबूत करने और पेट की समस्याओं से राहत देने में उपयोगी है. इसकी छाल का उपयोग दांत दर्द और गले की खराश में भी किया जाता है. गर्मियों में शरीर को ठंडक पहुंचाने वाला यह फल प्राकृतिक औषधि की तरह काम करता है.

उत्तराखंड आने वाले पर्यटकों के बीच काफल काफी लोकप्रिय होता जा रहा है. पहाड़ घूमने पहुंचे लोग स्थानीय बाजारों और सड़कों पर काफल खरीदते नजर आते हैं. इसका अनोखा स्वाद पर्यटकों को बेहद पसंद आता है. कई लोग इसे पहाड़ों की खास पहचान मानते हैं. काफल से बने नमक-मसाले वाले स्वाद को लोग बड़े चाव से खाते हैं. सोशल मीडिया पर भी काफल की तस्वीरें और वीडियो खूब वायरल होते हैं. गर्मियों में पहाड़ी पर्यटन के साथ काफल की बिक्री भी बढ़ जाती है. स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि बाहर से आने वाले लोग अक्सर काफल के बारे में पूछते हैं, इसका स्वाद चखने के बाद दोबारा जरूर खरीदते हैं.

गर्मियों का मौसम शुरू होते ही उत्तराखंड के पहाड़ों में काफल की मांग तेजी से बढ़ जाती है. यह जंगली फल अपने खट्टे-मीठे स्वाद के कारण बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को पसंद आता है. लाल और गहरे बैंगनी रंग का काफल जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगता है, मई-जून के महीनों में बाजारों में दिखाई देता है. स्थानीय लोग सुबह-सुबह जंगलों से काफल तोड़कर बाजारों तक पहुंचाते हैं. सड़क किनारे छोटे दुकानदार भी इसे बेचते नजर आते हैं.

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