Fatty Liver Disease: भारत में एक खामोश महामारी अपने पैर पसार रही है. इसका नाम है फैटी लिवर डिजीज. मेडिकल जर्नल लैंसेट की हालिया और बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट ने देश के स्वास्थ्य विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का हर 10 में 4 व्यक्ति नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर की समस्या से जूझ रहे हैं. अगर इसमें सिर्फ वयस्कों को जोड़ें तो करीब 4 में से एक वयस्क भारतीयों को नॉन अल्कोहलकि फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) है. इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि जिन लोगों को फैटी लिवर डिजीज हैं, उनमें से अधिकांश को पता भी नहीं कि उन्हें फैटी लिवर डिजीज है क्योंकि इसके लक्षण उपर से नहीं दिखते हैं और साधारण जांच से भी इसका पता नहीं चलता.
रिपोर्ट में क्या कहा गया
लेंसेट की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 27 शहरों में फैटी लिवर को लेकर एक स्टडी की गई. इसमें पाया गया कि 10 में 4 व्यक्ति को फैटी लिवर की बीमारी है. यह अध्ययन पिछले महीने मेडिकल जर्नल द लेंसेट रिजनल हेल्थ-साउथ इस्ट एशिया में प्रकाशित हुआ था. इसमें 7,764 वयस्कों की जांच की गई, जिनमें से 39 प्रतिशत लोगों में नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिज़ीज़ पाई गई. इस बीमारी को अब मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टियोटिक लिवर डिज़ीज़ (MASLD) के नाम से भी जाना जाता है. सीएसआईआर के प्रोफेसर और स्टडी के प्रमुख शोधकर्ता शांतनु सेनगुप्ता ने बताया कि ज्यादातर स्टडी अस्पतालों या खास जोखिम वाले समूहों तक सीमित थीं. इसलिए देश में इस बीमारी का असली बोझ कितना है, इसका सही अंदाजा लगाना मुश्किल था. लेकिन फिनोम इंडिया–CSIR हेल्थ कोहोर्ट ने इस कमी को दूर करने का मौका दिया. इससे अलग-अलग राज्यों में दिल और मेटाबॉलिक बीमारियों के खतरे की तुलना एक समान तरीके से की जा सकी.रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर समय रहते इसका इलाज या रोकथाम नहीं की गई, तो भविष्य में सिरोसिस (लिवर सिकुड़ना), लिवर कैंसर और लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत जैसे गंभीर मामलों में बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है.
क्यों होती फैटी लिवर डिजीज
फैटी लिवर डिजीज तब होती है जब ऐसे लोगों के लिवर में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा हो जाती है जो बहुत कम या बिल्कुल शराब नहीं पीते. जब लिवर के कुल वजन का 5 से 10 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा चर्बी हो जाता है, तो उसे स्टियाटोसिस कहा जाता है. यह फैटी लिवर बीमारी का शुरुआती चरण होता है. इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सीएसआईआर की 37 लैब्स के स्थायी कर्मचारियों और उनके जीवनसाथियों की जांच की. जांच के दौरान लिवर में स्टिफनेस यानी कड़ापन, दिल और मेटाबॉलिज्म से जुड़े जोखिम कारकों को देखा गया.
फैटी लिवर डिजीज का कारण क्या है
मायो क्लीनिक के मुताबिक फैटी लिवर डिजीज के लिए मुख्य रूप से मोटापा, डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस और जीन जिम्मेदार है. इन सबके लिए खराब लाइफस्टाइल जिम्मेदार है. यानी गतिहीन जीवनशैली के कारण आजकल कम उम्र में ही फैटी लिवर डिजीज होने लगी है. लोग अपने कामकाज में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें एक्सरसाइज करने के लिए समय ही नहीं मिलता. इसके अलावा खान-पान बहुत खराब हो गया है. बाहर का खाना जिसमें तेल, नमक और चीनी ज्यादा होता है, वे इस बीमारी के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार है. कुछ मामलों में शरीर में कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड्स का बढ़ना भी फैटी लिवर की बीमारी को बढ़ा सकता है.
किन लोगों को ज्यादा खतरा
शोध टीम ने मोटापा, बॉडी मास इंडेक्स (BMI), डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल स्तर, ब्लड प्रेशर और लिवर में हार्डनेस (फाइब्रोसिस) जैसी चीजों की जांच की और देखा कि इनका बीमारी से क्या संबंध है. नतीजों में पाया गया कि जिन लोगों को यह बीमारी थी, उनमें मोटापा आम था. लेकिन अगर किसी को डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर दोनों था, तो उसमें फैटी लिवर का खतरा और ज्यादा बढ़ गया. इसलिए ऐसे लोगों को नियमित जांच कराना जरूरी है.
फैटी लिवर डिजीज से बचने के लिए क्या करें
मारेंगो एशिया अस्पताल में मेटाबोलिक डिसॉर्डर डिपार्टमेंट के प्रमुख डॉ. पारस अग्रवाल ने बताया कि फैटी लिवर की बीमारी हो ही नहीं, इसके लिए आपको सबसे पहले आधुनिक दिनचर्या छोड़ना होगा. जैसे हमारे पूर्वजों की लाइफस्टाइल थी, अगर वैसा रखेंगे तो फैटी लिवर का खतरा लगभग खत्म हो जाएगा. इसमें घर का बना कुदरती भोजन जिसमें ज्यादा तेल, नमक न हो, वो खाएं. हरी सब्जियां, फल, सीड्स आदि का भरपूर सेवन करें. रोज दाल खाएं और रोज एक्सरसाइज करें. एक्सरसाइज में आप रोज वॉक करें, थोड़ी दौड़ लगा लें, सीढ़ियों पर उपर-नीचे करें किसी न किसी तरह से अपने शरीर को गतिशील रखें. इसके साथ ही खुश रहें और पर्याप्त नींद लें. अगर ऐसा करेंगे तो फैटी लिवर ही नहीं, कई तरह की मेटाबोलिक बीमारियों का खतरा कम हो जाएगा.

