Hair transplant-Cosmetic surgery Risk: सुंदर और स्मार्ट दिखना कौन नहीं चाहता. खूबसूरत बनने के लिए लोग धुआंधार पैसा उड़ाने से भी गुरेज नहीं करते. लोगों की इसी कमजोरी को भुनाने का धंधा आज खूब फल-फूल रहा है, लेकिन इस धंधे से अलग कहीं ऐसा न हो कि आपकी सुंदर दिखने की चाहत आपको ले डूबे और आप अपने बालों और वास्तविक चेहरे से भी हाथ धो बैठें. सोशल मीडिया पर ऐसा ही शातिर खेल चल रहा है, जिसे लेकर डॉक्टरों की कई बड़ी संस्थाओं ने लोगों के लिए न केवल वॉर्निंग जारी की है, बल्कि इस पर लगाम लगाने की भी मांग की है.
देश की बड़ी मेडिकल बॉडीज में शुमार इंडियन एसोसिएशन ऑफ डर्मेटोलॉजिस्ट, वेनेरोलॉजिस्ट एंड लेप्रोलॉजिस्ट (IADVL) और एसोसिएशन ऑफ प्लास्टिक सर्जन्स ऑफ इंडिया (APSI) ने सोशल मीडिया पर आ रही डॉक्टरों के सफल उपचार के दावों की बाढ़ और मरीजों को ग्राहक समझकर दिए जा रहे एस्थेटिक और हेयर रेस्टोरेशन प्रोसीजरों में मरीजों की सुरक्षा और ट्रेनिंग स्टैंडर्ड्स को लेकर गहरी चिंता जताई है.
डॉक्टरों ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे बड़े युवा डेमोग्राफिक्स में से एक है और हाल के वर्षों में स्किन, बाल और अन्य एस्थेटिक प्रोसीजर जैसे बोटॉक्स, हेयर ट्रांसप्लांट और थ्रेड लिफ्ट की मांग तेजी से बढ़ी है. यही वजह है कि भारत के युवा एस्थेटिक और डर्मेटोलॉजिकल मार्केटिंग के टार्गेट कंज्यूमर बन गए हैं और शातिर लोग इसका फायदा उठाने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहे हैं. सोशल मीडिया पर ऐसे बहुत सारे विज्ञापन दावों के साथ चल रहे हैं और मरीज उनके शिकार भी बन रहे हैं, जो कि बड़ी चिंता की बात है.
कहां से शुरू हुआ झोल?
दोनों संस्थाओं से जुड़े डॉक्टरों ने कहा कि डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया (DCI) द्वारा डेंटिस्ट्स एक्ट, 1948 के प्रावधानों के तहत MDS डेंटल सर्जनों को कुछ एस्थेटिक प्रोसीजर और हेयर ट्रांसप्लांटेशन करने की अनुमति दे दी थी. जिसके बाद से यह मामला और भी महत्वपूर्ण हो गया है. मेडिकल बॉडीज के मुताबिक, लोगों के चेहरे, स्किन और बाल आदि से संबंधित ये सर्जिकल प्रोसीजर पारंपरिक रूप से नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत ट्रेंड डर्मेटोलॉजिस्ट और प्लास्टिक सर्जन जैसे स्पेशलिस्ट द्वारा किए जाते रहे हैं.
हेयर ट्रांसप्लांट, स्किन ग्राफ्टिंग, बोटोक्स हैं टिपिकल सजर्री
एपीएसआई से जुड़े डॉक्टरों ने कहा कि ऐसे सर्जिकल प्रोसीजर के लिए स्किन की बायोलॉजी, बालों के डिसऑर्डर, इन्फेक्शन मैनेजमेंट और संभावित कॉम्प्लीकेशंस को संभालने की गहरी समझ होना बेहद जरूरी है. चूंकि हेयर ट्रांसप्लांट एक मॉडर्न मेडिकल प्रोसीजर है और इसे केवल रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर्स (RMPs) द्वारा ही किया जाना चाहिए जो इस क्षेत्र में विशेषज्ञता रखते हों.
जान जाने से लेकर आंखों की रोशनी तक गई
डॉक्टरों ने कहा कि देखा जा रहा है कि पिछले कुछ साल से ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है, जिनमें बिना पर्याप्त योग्यता वाले लोगों पर एस्थेटिक मेडिकल प्रोसीजर करने के आरोप लगे हैं. कानपुर हेयर ट्रांसप्लांट केस इसका एक बड़ा उदाहरण है, जिसमें हेयर ट्रांसप्लांट के बाद दो इंजीनियरों की मौत हो गई थी.आरोप है कि यह प्रोसीजर एक डेंटल सर्जन द्वारा किया गया था. देश के कई हिस्सों में बिना योग्य मेडिकल प्रैक्टिशनर्स द्वारा एस्थेटिक प्रोसीजर करने के अन्य मामले भी सामने आए हैं, जिनमें किसी को गंभीर संक्रमण हो गया तो किसी की आंखों की रोशनी चली गई.
मेडिकल एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी कि स्किन की बीमारियों, बालों के डिसऑर्डर और सर्जिकल कॉम्प्लीकेशंस के मैनेजमेंट में पर्याप्त मेडिकल ट्रेनिंग के बिना प्रोफेशनल्स को ऐसे प्रोसीजर करने की अनुमति देने से ट्रेनिंग के स्टैंडर्ड कम हो सकते हैं और मरीजों के लिए रिस्क बढ़ सकता है.
एमबीबीएस की डिग्री नहीं काफी
आईएडीवीएल के अध्यक्ष डॉ. विनय सिंह का कहना है कि हेयर ट्रांसप्लांट जैसे प्रोसीजर करने के लिए एस्थेटिक प्रोसीजर और डर्मेटोलॉजी में एक्स्ट्रा ट्रेनिंग की जरूरत होती है. एमबीबीएस डिग्री के अलावा, डर्मेटोलॉजिस्ट ट्रेनिंग प्रोग्राम के तहत मान्यता प्राप्त मेडिकल स्कूलों में डर्मेटोलॉजी में पोस्टग्रेजुएट स्तर पर तीन साल की रेजिडेंसी करनी होती है. इस ट्रेनिंग में त्वचा की विभिन्न बीमारियों, बालों की समस्याओं और डर्मेटोलॉजी से जुड़े एडवांस्ड प्रोसीजर का अध्ययन शामिल होता है.
सोशल मीडिया के डॉक्टर खतरनाक
डॉ. सिंह ने कहा कि आजकल स्किन और बालों से जुड़ी समस्याओं को लेकर सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल हो रहा है और लोग केमिस्ट या अन्य गैर-चिकित्सकीय प्रशिक्षित व्यक्तियों की सलाह पर दवाओं का इस्तेमाल करने लगते हैं. सोशल मीडिया पर फ्रॉड मार्केटिंग लिस्टिंग भी चल रही है. कई वेबसाइटें पेड ऐड प्लेसमेंट के जरिए डर्मेटोलॉजिस्ट के रूप में ऐसे लोगों को प्रमोट करती हैं, जिनके पास प्रैक्टिस के लिए बहुत कम या कोई सत्यापित मेडिकल क्वालिफिकेशन नहीं होती. यह स्थिति लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बन सकती है.
एड और मार्केटिंग को रोकना जरूरी
एसोसिएशनों ने कहा कि मेडिकल प्रैक्टिस के विज्ञापन और मार्केटिंग को नियंत्रित करने के लिए बेहतर औपचारिक और कानूनी नियंत्रण प्रणाली की जरूरत है. IADVL की तमिलनाडु ब्रांच (रिट पिटीशन नंबर 36164 और 12044 ऑफ 2024) ने डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया की 06 दिसंबर 2022 की गाइडलाइंस को चुनौती देते हुए मद्रास हाई कोर्ट में कानूनी कार्रवाई शुरू की है. इन गाइडलाइंस में ओरल और मैक्सिलोफेशियल सर्जनों को कुछ एस्थेटिक और हेयर ट्रांसप्लांट प्रोसीजर करने की अनुमति दी गई थी.
हाल ही में कोर्ट ने दिया आदेश
21 जनवरी 2026 को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया और नेशनल मेडिकल कमीशन के बीच रेगुलेटरी टकराव पर ध्यान दिया और केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को मामले की जांच कर मरीजों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट रेगुलेटरी दिशा-निर्देश सुनिश्चित करने के लिए अपना जवाब देने का निर्देश दिया है.
वहीं अब एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि पूरी गाइडलाइंस जारी की जाएं और मौजूदा नियमों को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि झोलाछाप डॉक्टरों पर रोक लगाई जा सके और लोगों की सेहत की बचाई जा सके.
आम लोगों को दी विशेष सलाह
डॉक्टरों ने कहा कि कोर्ट और सरकारें अपना काम कर रही हैं लेकिन इसके लिए आम लोगों को जागरुक होने की बेहद जरूरत है, ताकि मरीज ऐसे जाल में न फंसें. अगर आप कोई भी स्किन, कॉस्मेटिक या हेयर ट्रीटमेंट लेने जा रहे हैं और आपने सोशल मीडिया या कहीं और विज्ञापन और सफल उपचार के दावे देखने के बाद एक्सपर्ट को चुना है तो ट्रीटमेंट से पहले डॉक्टर की क्वालिफिकेशन और स्टेट मेडिकल काउंसिल में उनका रजिस्ट्रेशन अवश्य वेरिफाई करें. डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन नंबर प्रिस्क्रिप्शन पर स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए.
लोगों को यह भी सतर्क रहने की सलाह दी गई है कि वे बिना लाइसेंस वाले डॉक्टरों के भ्रामक विज्ञापनों और ट्रीटमेंट से बचें, नहीं तो उन्हें अपने नेचुरल बाल और चेहरे की खूबसूरती से हाथ धोना पड़ सकता है.

