Working mother guilt and child care aiims psychiatrist doctor rajesh sagar advise| वर्किंग मदर्स के बच्चों पर क्रेच के मानसिक प्रभाव – एक्सपर्ट की राय

Working mother guilt and child care aiims psychiatrist doctor rajesh sagar advise| वर्किंग मदर्स के बच्चों पर क्रेच के मानसिक प्रभाव – एक्सपर्ट की राय


Working Mother and Child in Creche effects: न्यूक्लियर फैमिली के इस दौर में आज की वर्किंग मदर का सबसे बड़ा दर्द है अपने छोटे-छोटे बच्चों को खुद से दूर 10-11 घंटे के लिए क्रेच में रखना. मां को छोड़ते हुए बिलखते ये मासूम बच्चे भले ही ये नहीं बता पाते कि उन्हें किसी भी कीमत पर सिर्फ मां चाहिए, लेकिन उनका व्यवहार कई सवाल खड़े करता है. दूरी का यह तनाव मां और बच्चा दोनों ही झेलते हैं और यही वजह है कि अक्सर मांएं इस बात से परेशान रहती हैं कि कहीं यह बच्चे के ऊपर जुल्म तो नहीं है? क्या इतनी छोटी उम्र में मां से दूरी का कष्ट और स्ट्रैस झेल रहा बच्चा आगे चलकर मानसिक रूप से कमजोर तो नहीं हो जाएगा या क्या इसका और भी ज्यादा खराब असर तो नहीं पड़ेगा?

कामकाजी मांओं की इस दुविधा पर News18hindi ने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज नई दिल्ली के साइकेट्री विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजेश सागर से बात की है. आइए एक्सपर्ट सलाह से जानते हैं कि क्रेच में रहने वाले बच्चों की मांओं को टेंशन लेने की जरूरत है या नहीं?

डॉ. राजेश सागर कहते हैं, ‘देखिए ये बात सही है कि बच्चे को मां की जरूरत सबसे ज्यादा होती है और जब मां से उसे अलग करते हैं तो उसके लिए एक शब्द इस्तेमाल करते हैं सेपरेशन एंग्जाइटी. यह खासकर तब होता है जब शुरू से घर में रहने वाला बच्चा पहली बार स्कूल जाता है तो वह रोता है, परेशान होता है और कभी-कभी चिड़चिड़ा हो जाता है. ऐसे में सेपरेशन एंग्जाइटी एक महत्वपूर्ण कंडीशन है. हालांकि स्कूल जाने वाला बच्चा 4-5 साल का होता है.’

लेकिन अगर उससे भी छोटे बच्चे क्रेच में छोड़े जाते हैं तो उनमें मानसिक तनाव होने का रिस्क बढ़ सकता है. क्योंकि क्रेच जाने वाला बच्चा बहुत छोटा है और उसको मां से जो इमोशनल सपोर्ट मिलना चाहिए वह नहीं मिलता है, तो ऐसे बच्चों की मेंटल हेल्थ पर असर हो सकता है. वे मेंटली कमजोर हो सकते हैं. हालांकि ये जरूरी नहीं है कि यह परेशानी सभी बच्चों में हो.

क्या मेंटली परेशान होने वाले बच्चों में कुछ लक्षण दिखते हैं?
कुछ बच्चे नाजुक होते हैं जिनमें मेंटल हेल्थ इश्यूज का रिस्क फैक्टर होता है. तो उनमें कुछ लक्षण नजर आ सकते हैं. जैसे ज्यादा रोना, चिड़चिड़ाना, कभी-कभी आक्रामक हो जाना, खाना अवॉइड कर देना, ढीला, सुस्त या बीमार होना आदि. ये व्यवहार इसलिए आता है क्योंकि आपने उसे मां से अलग कर दिया है. लेकिन ये भी देखा जाता है कि ऐसा बर्ताव बच्चे शुरू में ज्यादा करते हैं लेकिन जब बच्चा एडजस्ट करने लगता है तो यह धीरे-धीरे कम भी हो जाता है.

क्या ऐसे बच्चे भविष्य में मानसिक बीमारियों के ज्यादा शिकार बनते हैं हैं?
देखिए सभी में ऐसा नहीं होता, लेकिन कुछ बच्चे जो ईजी टू हर्ट हैं यानि जो बहुत जल्दी खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं और हर किसी के साथ घुलते-मिलते नहीं हैं तो ऐसे बच्चों में मेंटल हेल्थ इश्यूज का खतरा हो सकता है. इसके अलावा मल्टीपल फैक्टर्स भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं.

क्या ये परेशानी हमेशा हो सकती है?
नहीं जरूरी नहीं है कि आज जो बच्चा क्रेच में जाने में रो रहा है, परेशान है और स्ट्रेस में है वह आगे भी ऐसा ही रहेगा. जैसे-जैसे बच्चा घुलेगा-मिलेगा ये परेशानी कम भी हो सकती है और कुछ कोशिशों से उसे ठीक भी किया जा सकता है. हालांकि कुछ बच्चे इसका अपवाद रह सकते हैं.

क्या मां से दूर रहने का अच्छा असर भी होता है?
हां बिल्कुल. मां या कहें कि एक सुरक्षित वातावरण से कुछ समय के लिए बच्चे को अलग करना भी बच्चे के विकास के लिए जरूरी है. क्योंकि जो बच्चे पूरी तरह मां पर निर्भर रहते हैं, उनका स्वभाव और व्यवहार आगे भी इसी आधार पर डिपेंडेंसी का होता जाता है. इसलिए कभी-कभी इसका फायदा भी होता है क्योंकि मां से थोड़ा अलग होने से उसमें एक मजबूती आती है और वह सर्वाइवल सीखता है. उसमें इंडिविजुअलाइजेशन आ सकता है और इसकी थोड़ी-थोड़ी शुरुआत छोटी उम्र से भी हो सकती है. इसीलिए बेलेंस होना जरूरी है.

10 घंटे दूर, 14 घंटे मां के पास है बच्चा , तो क्या ये नॉर्मल है?
10 घंटे का समय बड़ा है तो ऐसे में यह जरूरी है कि जहां बच्चा रह रहा है वहां की केयरटेकर एक को-मदर के रूप में काम करें. बच्चे का ध्यान रखना, उसके साथ बॉन्डिंग बनाना और उसे सहज करने से इस दूरी की भरपाई की जा सकती है.

जहां तक 10 और 14 घंटे के अनुपात की बात है तो हम ये नहीं कह सकते कि क्रेच में बच्चों को रखना ही नहीं चाहिए, क्योंकि इससे सभी लोग पैनिक हो जाएंगे, बच्चे को रखते हुए डरेंगे और काम छोड़ने लगेंगे. तो यहां ये कहा जा सकता है कि जो बच्चे थोडे सेंसिटिव या वलरेनेवल होते हैं, उनके लिए मां से दूरी कठिन है.

बच्चा नाजुक है कैसे पहचाना जाए? क्या कुछ लक्षण हैं?

इसके कई फैक्टर्स हैं.बच्चे का असेसमेंट करना होता है. सबसे बड़ी बात है कि हर बच्चा अलग-अलग होता है, ऐसे में सभी के लिए एक सी बात नहीं कही जा सकती. कुछ बच्चे जल्दी किसी से भी हिल-मिल जाते हैं, कुछ बच्चे दूसरे को देखकर रोने लगेंगे. कुछ बच्चे ऐसे व्यवहार करेंगे कि ठीक है और आपके साथ को ज्यादा एंजॉय नहीं करेंगे. तो जो नाजुक हैं उन्हें परेशानी हो सकती है लेकिन उनकी संख्या कम है.

इसके बारे में हर मां बेहतर जान सकती है. वह पता लगा सकती है कि उसका बच्चा किस तरह सुरक्षित और खुश महसूस करता है. उसका व्यवहार कितना बदल रहा है, वह खाने-पीने में कैसा बर्ताव कर रहा है. क्या उसकी नींद की साइकिल खराब हो गई है. क्या वह चिड़चिड़ा हो गया है? या वह रिस्पॉन्ड ही नहीं कर रहा है. वह अगर दूर होता है तो कितनी देर परेशान रहता है और कितनी देर बाद ठीक हो जाता है, तो ये सभी चीजें मां को नोट करनी चाहिए.

बच्चा अगर दिन भर रोता है, बार-बार बीमार पड़ रहा है, तो क्या मानें?

देखिए बच्चा अगर रो रहा है और लगातार रो रहा है तो इसका मतलब है कि वह कहीं न कहीं अनकंफर्टेबल है. अगर बच्चा बार-बार बीमार हो रहा है तो यह भी उसके डिस्कंफर्ट का लक्षण हो सकता है. ऐसे बच्चे को असेस करना जरूरी है.

वर्किंग मदर्स को क्या करना चाहिए?
चूंकि एक मां की मजबूरी है तो वह बच्चे को दूर रखेगी ही लेकिन जितना ज्यादा क्वालिटी टाइम बच्चे के साथ बिता पाएं, उसकी कोशिश करनी चाहिए. इसे हम अटैचमेंट बॉन्ड कहते हैं, जो मां के साथ बच्चे का होता है. ध्यान रखें कि बच्चे के साथ सिर्फ घंटे गिनकर बिताना काफी नहीं हैं, बच्चों को महसूस होना चाहिए कि आप उनके साथ हैं. आप बच्चे के साथ खेलें, उसके साथ वो सब चीजें करें जो करते हुए वह खुश होता है. बच्चे के साथ रहते हुए फोन, टीवी या डिस्ट्रैक्शन वाली चीजों से दूर रहें. बच्चे को संतुष्ट करें. इससे उन 10 घंटों की भरपाई हो सकती है.

अगर बच्चे में सुधार न दिखे तो मां क्या करे?
अगर बच्चे के साथ कोशिश करने के बाद भी उसकी सेहत, व्यवहार और स्वभाव में सुधार न आ रहा हो, वह फिर भी सुस्त, उदास या आक्रामक और चिड़चिड़ा हो रहा हो, बार-बार बीमार पड़ रहा हो तो माता-पिता किसी भी पीडियाट्रिक साइकोलॉजिस्ट से मदद ले सकते हैं.



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